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Atharvaveda - Mantra 50

Atharvaveda 11/3/50

10 Sukta
56 Mantra
11/3/50
Devata- मन्त्रोक्ताः Rishi- अथर्वा Chhanda- आसुर्यनुष्टुप् Suktam- ओदन सूक्त
Mantra with Swara
ए॒तद्वै ब्र॒ध्नस्य॑ वि॒ष्टपं॒ यदो॑द॒नः ॥

ए॒तत् । वै । ब्र॒ध्नस्य॑ । वि॒ष्टप॑म् । यत् । ओ॒द॒न: ॥५.१॥

Mantra without Swara
एतद्वै ब्रध्नस्य विष्टपं यदोदनः ॥

एतत् । वै । ब्रध्नस्य । विष्टपम् । यत् । ओदन: ॥५.१॥

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Meaning
१. (यत् एतत् ओदन:) = यह जो ब्रह्मौदन-सुखों से हमें सिक्त करनेवाला वेदज्ञान है, वह (वै) = निश्चय से (बध्नस्य) = इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपने में बाँधनेवाले महान् प्रभु का [ब्रह्मा का] (विष्टपम्) = लोक है, अर्थात् यह वेदज्ञान हमें प्रभु की ओर ले-चलनेवाला है। २. (यः एवं वेद) = जो इसप्रकार इस ओदन के आधार को समझ लेता है, वह (बध्नलोकः भवति) = ब्रह्मलोकवाला होता है, अर्थात् (बध्नस्य विष्टपि) = उस सब ब्रह्माण्ड को अपने में बाँधनेवाले महान् प्रभु के लोक में (श्रयते) = आश्रय करता है।
Essence
यह ब्रह्मौदन [वेदज्ञान] ब्रह्म का लोक है। वेद को समझनेवाला पुरुष ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है।
Subject
बध्नस्य विष्टपम्