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Atharvaveda - Mantra 18

Atharvaveda 11/3/18

10 Sukta
56 Mantra
11/3/18
Devata- बार्हस्पत्यौदनः Rishi- अथर्वा Chhanda- आसुर्यनुष्टुप् Suktam- ओदन सूक्त
Mantra with Swara
च॒रुं पञ्च॑बिलमु॒खं घ॒र्मो॒भीन्धे॑ ॥

च॒रुम् । पञ्च॑ऽबिलम् । उ॒खम् । घ॒र्म: । अ॒भि । इ॒न्धे॒ ॥३.१८॥

Mantra without Swara
चरुं पञ्चबिलमुखं घर्मोभीन्धे ॥

चरुम् । पञ्चऽबिलम् । उखम् । घर्म: । अभि । इन्धे ॥३.१८॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (ऋतव:) = ऋतुएँ (पक्तार:) = इस ओदन को पकानेवाली हैं। ज्ञानरूप ओदन का पाक काल के अधीन तो है ही। (आर्तवा:) = ऋतु-सम्बन्धी अहोरात्र (समिन्धते) = इसे सन्दीस करते हैं। ब्रह्मौदन के पकाने की साधनभूत ज्ञानाग्नि को दीप्त करते हैं। दिन-रात्रि में परिवर्तन के साथ ज्ञान में वृद्धि होती चलती है। २. (पञ्चबिलम् चरुम्) = 'गौ, अश्व, पुरुष, अजा, अवि' रूप पञ्चधा विभिन्न मुखवाली ब्रह्मौदन [चरु] के पाचन की साधनभूत स्थालों को (घर्म:) = यह आदित्य (अभीन्धे) = सम्यक् दीप्त करता है। ज्ञानाग्नि को दीस करने में सूर्य का प्रमुख स्थान है। सूर्य-किरणें केवल शरीर के स्वास्थ्य को ही नहीं बढ़ाती, बुद्धि को भी स्वस्थ करती हैं।
Essence
ऋतुएँ, ऋतु-सम्बन्धी अहोरात्र तथा सूर्य-किरणें हमारी बुद्धि की वृद्धि का साधन बनती हैं।

 
Subject
ब्रह्मौदन के पक्ता [पाचक]