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Atharvaveda - Mantra 12

Atharvaveda 11/3/12

10 Sukta
56 Mantra
11/3/12
Devata- बार्हस्पत्यौदनः Rishi- अथर्वा Chhanda- याजुषी जगती Suktam- ओदन सूक्त
Mantra with Swara
सीताः॒ पर्श॑वः॒ सिक॑ता॒ ऊब॑ध्यम् ॥

सीता॑: । पर्श॑व: । सिक॑ता: । ऊब॑ध्यम् ॥३.१२॥

Mantra without Swara
सीताः पर्शवः सिकता ऊबध्यम् ॥

सीता: । पर्शव: । सिकता: । ऊबध्यम् ॥३.१२॥

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Meaning
१. (राध्यमानस्य ओदनस्य) = पकाये जा रहे ब्रह्मौदन की (इयम् पथिवी एव) = यह पृथिवी ही (कुम्भी भवति)  देगची होती है और (द्यौः अपिधानम्) = धुलोक उस कुम्भी के मुख का छादक पात्र ढकना बनता है। इसप्रकार यह ब्रह्मौदन इस द्यावापृथिवी के सारे अन्तराल को व्यास करके वर्तमान हो रहा है। इसमें सब पिण्डों व पदार्थों का ज्ञान दिया गया है। (सीता:) = कर्षण से उत्पन्न, बीज का जिनमें आवषन होता है, वे लांगल-पद्धतियाँ इस ओदन के विराट् शरीर की (पर्शव:) = पार्श्व-स्थियों हैं । (सिकता:) = रेत:कण (ऊबध्यम) = उदरगत अजीर्ण अन्न के मल के समान हैं। २. (ऋतम्) = सत्य या व्यवस्थित [right] जीवन ही (हस्तावनेजनम्) = हाथ धोने का जल है। (कुल्या) = कुलों के लिए हितकर नीति इस ओदन का (उपसेचनम्) = मिश्रणसाधन-सेचन जल है।
Essence
वेद धुलोक से पृथिवीलोक तक सब पिण्डों का प्रतिपादन करता है। यहाँ 'सीता, सिकता, ऋत व कुल्या' इन सबका प्रतिपादन है।
Subject
ब्रह्मौदन का पाचन