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Atharvaveda - Mantra 10

Atharvaveda 11/3/10

10 Sukta
56 Mantra
11/3/10
Devata- बार्हस्पत्यौदनः Rishi- अथर्वा Chhanda- आसुरी पङ्क्तिः Suktam- ओदन सूक्त
Mantra with Swara
आ॒न्त्राणि॑ ज॒त्रवो॒ गुदा॑ वर॒त्राः ॥

आ॒न्त्राणि॑ । ज॒त्रव॑: । गुदा॑: । व॒र॒त्रा: ॥३.१०॥

Mantra without Swara
आन्त्राणि जत्रवो गुदा वरत्राः ॥

आन्त्राणि । जत्रव: । गुदा: । वरत्रा: ॥३.१०॥

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Meaning
१. (अस्य) = इस ब्रह्मौदन के विराट् शरीर के (श्यामम् अयः) = काले वर्ण का लोहधातु (मांसानि) = मांस स्थानापन्न है। (लोहितम्) = [अयः] लालवर्ण के ताम्र आदि धातु (अस्य लोहितम्) = इसका रुधिर ही है। (त्रपु) = सीसा (भस्म) = ओदनपाक के अनन्तर रहनेवाली राख ही है। (हरितम्) = मनोहारिवर्णवाला हेम [सोना] इसका (वर्ण:) = वर्ण है। (पुष्करम्) = कमल (अस्य गन्धः) = इस ओदन का गन्ध है। २. (खल:) = व्रीहि आदि धान्यों का पलाल से पृथक् करने का स्थान (पात्रम्) = यह ओदन का पात्र है। (स्फ्यौ) = दोनों 'स्पय' नामक यज्ञसाधन [A sword shaped implement used in sacrifices] इसके (अंसौ) = कैंधे हैं। (ईषे) = शकट-सम्बन्धी दण्ड इसके (अनूक्ये) = कन्धे व मध्यदेह के संधि-स्थल हैं, पृष्ठास्थिविशेष हैं। (जत्रव:) = जोत इसकी (आन्त्राणि) = आते हैं, (वरत्रा:) = रज्जुएँ (गुदा:) = गुदा स्थानापन्न हैं।
Essence
वेद में जहाँ 'लोहा, तांबा, सीसा, सोना' आदि धातुओं के वर्णन के साथ कमल आदि पुष्पों का वर्णन उपलभ्य है, वहाँ कृषक के साथ सम्बद्ध 'खल, स्फ्य, ईषा, जत्र, वरत्र' आदि वस्तुओं का भी प्रतिपादन है।
Subject
धातुएँ व कृषिसम्बद्ध पदार्थ