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Atharvaveda - Mantra 9

Atharvaveda 11/2/9

10 Sukta
31 Mantra
11/2/9
Devata- रुद्रः Rishi- अथर्वा Chhanda- आर्षी त्रिष्टुप् Suktam- रुद्र सूक्त
Mantra with Swara
च॒तुर्नमो॑ अष्ट॒कृत्वो॑ भ॒वाय॒ दश॒ कृत्वः॑ पशुपते॒ नम॑स्ते। तवे॒मे पञ्च॑ प॒शवो॒ विभ॑क्ता॒ गावो॒ अश्वाः॒ पुरु॑षा अजा॒वयः॑ ॥

च॒तु: । नम॑: । अ॒ष्ट॒ऽकृत्व॑: । भ॒वाय॑ । दश॑ । कृत्व॑: । प॒शु॒ऽप॒ते॒ । नम॑: । ते॒ । तव॑ । इ॒मे । पञ्च॑ । प॒शव॑: । विऽभ॑क्ता: । गाव॑: । अश्वा॑: । पुरु॑षा । अ॒ज॒ऽअ॒वय॑: ॥२.९॥

Mantra without Swara
चतुर्नमो अष्टकृत्वो भवाय दश कृत्वः पशुपते नमस्ते। तवेमे पञ्च पशवो विभक्ता गावो अश्वाः पुरुषा अजावयः ॥

चतु: । नम: । अष्टऽकृत्व: । भवाय । दश । कृत्व: । पशुऽपते । नम: । ते । तव । इमे । पञ्च । पशव: । विऽभक्ता: । गाव: । अश्वा: । पुरुषा । अजऽअवय: ॥२.९॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (भवाय) = संसार को उत्पन्न करनेवाले प्रभु के लिए (चतुः) = चार बार, चार ही बार क्यों? (अष्टकृत्व:) = आठ बार (नमः) = नमस्कार हो। पूर्वादि चारों दिशाओं में नमस्कार हो, और चार ही क्यों? अवान्तर दिशाओं को मिलाकर आठों दिशाओं में प्रभु के लिए हमारा नमस्कार हो। हे (पशुपते) = सब प्राणियों के रक्षक प्रभो ! (दशकृत्व:) = दस बार (ते नम:) = आपके लिए नमस्कार हो। चार दिशा, चार अवान्तर दिशा तथा नीचे-ऊपर [धुवा-ऊर्ध्वा] को मिलाकर दस बार प्रभु को प्रणाम हो। २. हे प्रभो! (इमे) = ये (पञ्च पशवः) = पाँच पशु (तव) = आपके (विभक्ता:) = [वि भज् सेवायाम्] विशिष्ट रूप से सेवित है-आपके ये स्वभूत ही हैं-दाहिनी ओर (गाव: अश्वा:) = गौ व घोड़े, बीच में (पुरुषा:) = मनुष्य तथा बायी ओर (अजावयः) = बकरी व भेड़ें। वस्तुत: गौवें व घोड़े मनुष्य के दाहिने हाथ हैं, तो अजा-अवि उसके बायें हाथ के समान हैं। मानव-उन्नति में इन चारों पशुओं का महत्त्वपूर्ण स्थान है।
Essence
हम सब दिशाओं में प्रभु के लिए प्रणाम करते हैं। पशुपति प्रभु ने मनुष्य को केन्द्र में रखकर उसकी उन्नति में साधनभूत गौ-घोड़े, अजा व अवि आदि पशुओं को बनाया है।
Subject
पञ्च पशवः