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Atharvaveda - Mantra 8

Atharvaveda 11/2/8

10 Sukta
31 Mantra
11/2/8
Devata- रुद्रः Rishi- अथर्वा Chhanda- महाबृहती Suktam- रुद्र सूक्त
Mantra with Swara
स नो॑ भ॒वः परि॑ वृणक्तु वि॒श्वत॒ आप॑ इवा॒ग्निः परि॑ वृणक्तु नो भ॒वः। मा नो॒ऽभि मां॑स्त॒ नमो॑ अस्त्वस्मै ॥

स: । न॒: । भ॒व: । परि॑ । वृ॒ण॒क्तु॒ । वि॒श्वत॑: । आप॑:ऽइव । अ॒ग्नि: । परि॑ । वृ॒ण॒क्तु॒ । न॒: । भ॒व: । मा । न॒: । अ॒भि । मां॒स्त॒ । नम॑: । अ॒स्तु॒ । अ॒स्मै॒ ॥२.८॥

Mantra without Swara
स नो भवः परि वृणक्तु विश्वत आप इवाग्निः परि वृणक्तु नो भवः। मा नोऽभि मांस्त नमो अस्त्वस्मै ॥

स: । न: । भव: । परि । वृणक्तु । विश्वत: । आप:ऽइव । अग्नि: । परि । वृणक्तु । न: । भव: । मा । न: । अभि । मांस्त । नम: । अस्तु । अस्मै ॥२.८॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (सः भव:) = वह सुखोत्पादक प्रभु (न:) = हमें (विश्वतः परिवृणक्तु) = सब ओर से उपद्रवों से वर्जित [रहित] करे। (इव) = जैसे (अग्निः) = दग्ध करता हुआ (अग्नि आप:) = जलों को छोड़ देता है, इसी प्रकार (भव:) = वह उत्पादक प्रभु (न:) = हमें (परिवृणक्तु) = उपद्रवसमूह से परिवर्जित करे। २. पाप से रहित (न:) = हमें (मा अभिमांस्त) = वे प्रभु हिंसित न करें [मन्यतिहिंसाकर्मा]। (अस्मै) = इस प्रभु के लिए (नमः अस्तु) = हमारा सदा नमस्कार हो। यह प्रभु-नमन ही वस्तुतः हमें पापों व उपद्रवों से बचानेवाला बनता है।
Essence
प्रभकृपा से पाप हमें इसप्रकार छोड़ जाएँ, जैसेकि अग्नि जलों को छोड़ जाता है। हम रुद्र को प्रणाम करनेवाले बनें, रुद्र हमारे पापों का विनाश करें।
Subject
प्रभु नमन व पापवर्जन