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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 11/2/6

10 Sukta
31 Mantra
11/2/6
Devata- रुद्रः Rishi- अथर्वा Chhanda- आर्षी गायत्री Suktam- रुद्र सूक्त
Mantra with Swara
अङ्गे॑भ्यस्त उ॒दरा॑य जि॒ह्वाया॑ आ॒स्याय ते। द॒द्भ्यो ग॒न्धाय॑ ते॒ नमः॑ ॥

अङ्गे॑भ्य: । ते॒ । उ॒दरा॑य । जि॒ह्वायै॑ । आ॒स्या᳡य । ते॒ । द॒त्ऽभ्य: । ग॒न्धाय॑ । ते॒ । नम॑: ॥२.६॥

Mantra without Swara
अङ्गेभ्यस्त उदराय जिह्वाया आस्याय ते। दद्भ्यो गन्धाय ते नमः ॥

अङ्गेभ्य: । ते । उदराय । जिह्वायै । आस्याय । ते । दत्ऽभ्य: । गन्धाय । ते । नम: ॥२.६॥

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Meaning
१. हे (पशुपते) = सब पशुओं के रक्षक प्रभो! (ते मुखाय नमः) = आपके मुख के लिए नमस्कार करते हैं-आपसे दिये गये इस मुख के महत्त्व को समझते हुए हम इसका उचित आदर करते हैं। हे (भव) = उत्पादक प्रभो! (यानि) = जो (ते चक्षूषि) = आपकी दी हुई ये आँखे हैं, इनके लिए हम नमस्कार करते हैं। (ते) = आपसे दिये गये (त्वचे) = त्वचा के लिए, (रूपाय) = सौन्दर्य के लिए (संदृशे) = सम्यम् दर्शन व ज्ञान के लिए तथा (प्रतीचीनाय) = अन्त:स्थित प्रत्यगात्मरूप आपके लिए (नमः) = नमस्कार करते हैं। २.(ते) = आपके इन (अंगेभ्यः) = अंगों के लिए (उदराय) = उदर के लिए नमः नमस्कार करते हैं। (ते) = आपसे दी गई (जिह्वायै) = जिह्वा के लिए (आस्याय) = मुख के लिए-वाक्शक्ति के लिए नमस्कार करते हैं। (ते) = आपसे दिये गये (दद्धयः) = दाँतों के लिए तथा (गन्धाय) = गन्धग्राहक नाणेन्द्रिय के लिए नमस्कार करते हैं। इनका उचित प्रयोग ही इनका आदर है।
Essence
प्रभु से दिये गये मुख आदि अंगों का ठीक प्रयोग करते हुए हम प्रभु को नमस्कार करते हैं।

 
Subject
मुख आदि अंगों में प्रभुमहिमा का दर्शन