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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 11/2/5

10 Sukta
31 Mantra
11/2/5
Devata- रुद्रः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- रुद्र सूक्त
Mantra with Swara
मुखा॑य ते पशुपते॒ यानि॒ चक्षूं॑षि ते भव। त्व॒चे रू॒पाय॑ सं॒दृशे॑ प्रती॒चीना॑य ते॒ नमः॑ ॥

मुखा॑य । ते॒ । प॒शु॒ऽप॒ते॒ । यानि॑ । चक्षूं॑षि । ते॒ । भ॒व॒ । त्व॒चे । रू॒पाय॑ । स॒म्ऽदृशे॑ । प्र॒ती॒चीना॑य । ते॒ । नम॑: ॥२.५॥

Mantra without Swara
मुखाय ते पशुपते यानि चक्षूंषि ते भव। त्वचे रूपाय संदृशे प्रतीचीनाय ते नमः ॥

मुखाय । ते । पशुऽपते । यानि । चक्षूंषि । ते । भव । त्वचे । रूपाय । सम्ऽदृशे । प्रतीचीनाय । ते । नम: ॥२.५॥

Meaning
१. हे (पशुपते) = सब पशुओं के रक्षक प्रभो! (ते मुखाय नमः) = आपके मुख के लिए नमस्कार करते हैं-आपसे दिये गये इस मुख के महत्त्व को समझते हुए हम इसका उचित आदर करते हैं। हे (भव) = उत्पादक प्रभो! (यानि) = जो (ते चक्षूषि) = आपकी दी हुई ये आँखे हैं, इनके लिए हम नमस्कार करते हैं। (ते) = आपसे दिये गये (त्वचे) = त्वचा के लिए, (रूपाय) = सौन्दर्य के लिए (संदृशे) = सम्यम् दर्शन व ज्ञान के लिए तथा (प्रतीचीनाय) = अन्त:स्थित प्रत्यगात्मरूप आपके लिए (नमः) = नमस्कार करते हैं। २.(ते) = आपके इन (अंगेभ्यः) = अंगों के लिए (उदराय) = उदर के लिए नमः नमस्कार करते हैं। (ते) = आपसे दी गई (जिह्वायै) = जिह्वा के लिए (आस्याय) = मुख के लिए-वाक्शक्ति के लिए नमस्कार करते हैं। (ते) = आपसे दिये गये (दद्धयः) = दाँतों के लिए तथा (गन्धाय) = गन्धग्राहक नाणेन्द्रिय के लिए नमस्कार करते हैं। इनका उचित प्रयोग ही इनका आदर है।

 
Essence
प्रभु से दिये गये मुख आदि अंगों का ठीक प्रयोग करते हुए हम प्रभु को नमस्कार करते हैं।
Subject
मुख आदि अंगों में प्रभुमहिमा का दर्शन

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