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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 11/10/4

10 Sukta
27 Mantra
11/10/4
Devata- त्रिषन्धिः Rishi- भृग्वङ्गिराः Chhanda- विराडनुष्टुप् Suktam- शत्रुनाशन सूक्त
Mantra with Swara
अ॒न्तर्धे॑हि जातवेद॒ आदि॑त्य॒ कुण॑पं ब॒हु। त्रिष॑न्धेरि॒यं सेना॒ सुहि॑तास्तु मे॒ वशे॑ ॥

अ॒न्त: । धे॒हि॒ । जा॒त॒ऽवे॒द॒: । आदि॑त्य । कुण॑पम् । ब॒हु । त्रिऽसं॑धे: । इ॒यम् । सेना॑ । सुऽहि॑ता । अ॒स्तु॒ । मे॒ । वशे॑ ॥१२.४॥

Mantra without Swara
अन्तर्धेहि जातवेद आदित्य कुणपं बहु। त्रिषन्धेरियं सेना सुहितास्तु मे वशे ॥

अन्त: । धेहि । जातऽवेद: । आदित्य । कुणपम् । बहु । त्रिऽसंधे: । इयम् । सेना । सुऽहिता । अस्तु । मे । वशे ॥१२.४॥

Meaning
१.हे (जातवेद) = उत्पन्न ज्ञानवाले-समझदार (आदित्य) = [आदानात, दाप् लवने] समन्तात् शत्रुओं का खण्डन करनेवाले सेनापते! तू (बहु कुणपम्) = बहुत शवों को (अन्त: धेहि) = यहाँ रणांगण में स्थापित करनेवाला हो, अर्थात् (सहनश:) = शत्रुओं को धराशायी करनेवाला बन। २. (इमम्) = यह (सुहिता) = सम्यक् धारण की गई (मे सेना) = मेरी सेना त्(रिषन्धेः) = 'जल, स्थल व वायु सेना से मेलवाले मुख्य सेनापति के (वशे अस्तु) = वश में हो।
Essence
हमारा सेनापति समझदार, उपायकुशल [full of resources] व शत्रुओं का समन्तात् छेदन करनेवाला बने। सम्यक् धारण की गई यह सेना उसके वश में हो। विजय के लिए आवश्यक है कि हमारी सेना सुशिक्षित हो, उसका सम्यक् पालन किया जाए तथा वह पूर्णतया सेनापति के शासन में हो।
Subject
सुहिता सेना

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