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Atharvaveda - Mantra 26

Atharvaveda 11/10/26

10 Sukta
27 Mantra
11/10/26
Devata- त्रिषन्धिः Rishi- भृग्वङ्गिराः Chhanda- प्रस्तारपङ्क्तिः Suktam- शत्रुनाशन सूक्त
Mantra with Swara
म॑र्मा॒विधं॒ रोरु॑वतं सुप॒र्णैर॒दन्तु॑ दु॒श्चितं॑ मृदि॒तं शया॑नम्। य इ॒मां प्र॒तीची॒माहु॑तिम॒मित्रो॑ नो॒ युयु॑त्सति ॥

म॒र्मा॒विध॑म् । रोरु॑वतम् । सु॒ऽप॒र्णै: । अ॒दन्तु॑ । दु॒:ऽचित॑म् । मृ॒दि॒तम् । शया॑नम् । य: । इ॒माम् । प्र॒तीची॑म् । आऽहु॑तिम् । अ॒मित्र॑: । न॒: । युयु॑त्सति ॥१२.२६॥

Mantra without Swara
मर्माविधं रोरुवतं सुपर्णैरदन्तु दुश्चितं मृदितं शयानम्। य इमां प्रतीचीमाहुतिममित्रो नो युयुत्सति ॥

मर्माविधम् । रोरुवतम् । सुऽपर्णै: । अदन्तु । दु:ऽचितम् । मृदितम् । शयानम् । य: । इमाम् । प्रतीचीम् । आऽहुतिम् । अमित्र: । न: । युयुत्सति ॥१२.२६॥

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Meaning
१. (य:) = जो (अमित्र:) = शत्रु (न:) = हमारी (इमाम्) = इस (प्रतीचीम्) = शत्रु के अभिमुख जाती हुई (आहुतिम्) = युद्धयज्ञ में डाली गई बाण-प्रक्षेपरूप आहुति को [हु दाने] (युयुत्सति) = युद्ध करने के लिए चाहता है, अर्थात् जो हमारे आक्रमण को रोकने का प्रयन करता है, उस शत्रु को (अदन्तु) = गिद्ध आदि पक्षी खानेवाले बनें । २. उस शत्रु को, जोकि (सुपणैः) = शोभनपतन शरों से (मर्माविधम्) = मर्मस्थलों में विद्ध हुआ है, (दुश्चितम्) = [दुःखैः पूरितम्] दु:खों से जिसका हृदय भरा हुआ है-जिसे चारों ओर संकट-ही-संकट दीखता है-अतएव (रोरुवतम्) = अतिशयेन विलाप कर रहा है, (मृदितम्) = जो युद्ध में चूर्णीभूत [पिसा-हुआ] हो गया है, और (शयानम्) = भूमि पर लेट गया है-धराशायी हो गया है, ऐसे शत्रु को गिद्ध आदि पक्षी खा जाएँ।
Essence
जो हमारे शरप्रक्षेप के विरोध में युद्ध करना चाहता है, वह मर्माहत होकर धराशायी हो जाए और गिद्धों का भोजन बने।
Subject
शत्रु का 'मर्माहत व धराशायी' होना