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Atharvaveda - Mantra 17

Atharvaveda 11/10/17

10 Sukta
27 Mantra
11/10/17
Devata- त्रिषन्धिः Rishi- भृग्वङ्गिराः Chhanda- पथ्यापङ्क्तिः Suktam- शत्रुनाशन सूक्त
Mantra with Swara
यदि॑ प्रे॒युर्दे॑वपु॒रा ब्रह्म॒ वर्मा॑णि चक्रि॒रे। त॑नू॒पानं॑ परि॒पाणं॑ कृण्वा॒ना यदु॑पोचि॒रे सर्वं॒ तद॑र॒सं कृ॑धि ॥

यदि॑ । प्र॒ऽई॒यु: । दे॒व॒ऽपु॒रा: । ब्रह्म॑ । वर्मा॑णि । च॒क्रि॒रे । त॒नू॒ऽपान॑म् । प॒रि॒ऽपान॑म् । कृ॒ण्वा॒ना: । यत् । उ॒प॒ऽऊ॒चि॒रे । सर्व॑म् । तत् । अ॒र॒सम् । कृ॒धि॒ ॥१२.१७॥

Mantra without Swara
यदि प्रेयुर्देवपुरा ब्रह्म वर्माणि चक्रिरे। तनूपानं परिपाणं कृण्वाना यदुपोचिरे सर्वं तदरसं कृधि ॥

यदि । प्रऽईयु: । देवऽपुरा: । ब्रह्म । वर्माणि । चक्रिरे । तनूऽपानम् । परिऽपानम् । कृण्वाना: । यत् । उपऽऊचिरे । सर्वम् । तत् । अरसम् । कृधि ॥१२.१७॥

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Meaning
१. (यदि) = [यदा] जब (देवपुरा:) = देवनगरियों में निवास करनेवाले व्यक्ति (प्रेयु:) = शत्रु पर आक्रमण के लिए चलते हैं तब (ब्रह्म वर्माणि चक्रिरे) = ज्ञान को व प्रभु को अपना कवच बनाते हैं। इस ब्रह्मकवच से ये अपना रक्षण करनेवाले होते हैं। २. ज्ञानपूर्वक तथा प्रभुस्मरणपूर्वक (तनूपानम्) = अपने शरीरों का रक्षण तथा (परिपाणम्) = समन्तात् राष्ट्र का रक्षण (कृण्वाना:) = करते हुए ये (सर्व तत् अरसं कृधि) = उस सबको नि:सार कर देते हैं, (यत्) = जो (उप अचिरे) = हमारे विषय में शत्रुओं ने हीन बातें कही है। शत्रुओं की अभिमान भरी बातों को, उन्हें परास्त करके, ये व्यर्थ कर देते हैं।
Essence
देवलोग प्रभु को अपना कवच बनाकर शत्रु पर आक्रमण करते हैं। शत्रुओं को परास्त करके ये उनकी डींगों को समाप्त कर देते हैं।
Subject
देवों का ब्रह्मरूप वर्म