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Atharvaveda - Mantra 25

Atharvaveda 11/1/25

10 Sukta
37 Mantra
11/1/25
Devata- ब्रह्मौदनः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- विराड्जगती Suktam- ब्रह्मौदन सूक्त
Mantra with Swara
शृ॒तं त्वा॑ ह॒व्यमुप॑ सीदन्तु दै॒वा निः॒सृप्या॒ग्नेः पुन॑रेना॒न्प्र सी॑द। सोमे॑न पू॒तो ज॒ठरे॑ सीद ब्र॒ह्मणा॑मार्षे॒यास्ते॒ मा रि॑षन्प्राशि॒तारः॑ ॥

शृ॒तम् । त्वा॒ । ह॒व्यम् । उप॑ । सी॒द॒न्तु॒ । दै॒वा: । नि॒:ऽसृप्य॑ । अ॒ग्ने: । पुन॑: । ए॒ना॒न् । प्र । सी॒द॒ । सोमे॑न । पू॒त: । ज॒ठरे॑ । सी॒द॒ । ब्र॒ह्मणा॑म् । आ॒र्षे॒या: । ते॒ । मा । रि॒ष॒न् । प्र॒ऽअ॒शि॒तार॑: ॥१.२५

Mantra without Swara
शृतं त्वा हव्यमुप सीदन्तु दैवा निःसृप्याग्नेः पुनरेनान्प्र सीद। सोमेन पूतो जठरे सीद ब्रह्मणामार्षेयास्ते मा रिषन्प्राशितारः ॥

शृतम् । त्वा । हव्यम् । उप । सीदन्तु । दैवा: । नि:ऽसृप्य । अग्ने: । पुन: । एनान् । प्र । सीद । सोमेन । पूत: । जठरे । सीद । ब्रह्मणाम् । आर्षेया: । ते । मा । रिषन् । प्रऽअशितार: ॥१.२५

Meaning
परिपक्व ज्ञान प्राप्त होता है। हे ब्रह्मौदन ! तू (अग्नेः) = उस अग्नणी प्रभु से (निःसृप्य) = निकलकर (पुन:) = फिर (एनान्) = इन उपासकों को (प्रसीद) = प्राप्त हो। प्रभु के उपासक हृदयस्थ प्रभु से ज्ञान प्राप्त करते हैं। २. (सोमेन) = शरीर में सुरक्षित सोमशक्ति द्वारा (पूत:) = पवित्र हुआ-हुआ, हे ब्रह्मौदन! तू (ब्रह्मणाम्) = इन जानियों के (जठरे) = जठर में-इनके अन्दर (सीद) = आसीन हो। शरीर में सुरक्षित सोम ज्ञानाग्नि को दीप्त करता है और दीस ज्ञानाग्नि में ज्ञान पवित्र हो जाता है। (ते प्राशितार:) = वे ब्रह्मौदन को खानेवाले (आर्षेया:) = [ऋषिः वेदः, तस्य इमे] ज्ञान के उपासक लोग (मा रिषन्) = हिसित न हों।
Essence
प्रभु के उपासक परिपक्व ज्ञान को प्राप्त करते हैं-इन्हें अन्त:स्थ प्रभु से ज्ञान प्रास होने लगता है। शरीर में सुरक्षित सोम से ज्ञान की पवित्रता होती है। ब्रह्मौदन को खानेवाले ये ज्ञानभक्त पुरुष वासनाओं से हिंसित नहीं होते।
Subject
आर्षेय पुरुषों का अहिंसन

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