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Atharvaveda - Mantra 23

Atharvaveda 11/1/23

10 Sukta
37 Mantra
11/1/23
Devata- ब्रह्मौदनः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- ब्रह्मौदन सूक्त
Mantra with Swara
ऋ॒तेन॑ त॒ष्टा मन॑सा हि॒तैषा ब्र॑ह्मौद॒नस्य॒ विहि॑ता॒ वेदि॒रग्रे॑। अं॑स॒द्रीं शु॒द्धामुप॑ धेहि नारि॒ तत्रौ॑द॒नं सा॑दय दै॒वाना॑म् ॥

ऋ॒तेन॑ । त॒ष्टा । मन॑सा । हि॒ता । ए॒षा । ब्र॒ह्म॒ऽओ॒द॒नस्य॑ । विऽहि॑ता । वेदि॑: । अग्रे॑ । अं॒स॒द्रीम् । शु॒ध्दाम् । उप॑ । धे॒हि॒ । ना॒रि॒ । तत्र॑ । ओ॒द॒नम् । सा॒द॒य॒ । दै॒वाना॑म् ॥१.२३॥

Mantra without Swara
ऋतेन तष्टा मनसा हितैषा ब्रह्मौदनस्य विहिता वेदिरग्रे। अंसद्रीं शुद्धामुप धेहि नारि तत्रौदनं सादय दैवानाम् ॥

ऋतेन । तष्टा । मनसा । हिता । एषा । ब्रह्मऽओदनस्य । विऽहिता । वेदि: । अग्रे । अंसद्रीम् । शुध्दाम् । उप । धेहि । नारि । तत्र । ओदनम् । सादय । दैवानाम् ॥१.२३॥

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Meaning
१. ('यन्वेवान विष्णुमन्वविन्दस्तस्माद् वेदिर्नाम') = [श०१।२।५।१०] हृदय में प्रभु का दर्शन व प्राप्ति होती है, अत: हृदय ही वेदि है। यह (वेदिः) = हृदयरूप वेदि (ऋतेन तष्टा) = ऋत के द्वारा तनूकृत-सम्यङ् निर्मित होती है। सत्य से ही यह शुद्ध बनी रहती है। (मनसा) = मनन के द्वारा (एषा) = यह हिता-धारण की जाती है। इसका मुख्य कार्य मनन ही है। यह (अग्ने) = सृष्टि के प्रारम्भ में प्रभु द्वारा (ब्रह्मौदनस्य विहिता) = ब्रह्मौदन की बनाई गई है। प्रभु ने 'अग्नि' आदि ऋषियों के हृदय में इस ब्रह्मौदन [ज्ञान-भोजन] की स्थापना की, अत: यह हृदयवेदि ब्रह्मौदन की बेदि कहलाती है। २. हे (नारि) = गृह को उन्नतिपथ पर ले-चलनेवाली गृहिणि! तू इस वेदि को (शुद्धाम) = राग-द्वेष आदि मलों से शून्य तथा (अंसद्रीम्) = [अंसत्रम्-अंहसस्त्राणम्-नि०५।२६] अंहस् [पाप] का द्रावण करनेवाली-पाप को अपने से दूर भगानेवाली-निष्पाप बनाकर (उपधेहि) = प्रभु की उपासना में धारण कर-शुद्ध निष्पाप हदय से प्रभु की उपासना में प्रवृत्त हो। (तत्र) = उस शुद्ध हृदयवेदि में (दैवानाम्) = सूर्य-चन्द्र, नक्षत्र आदि सब देवों के (ओदनम) = ज्ञानरूप भोजन को (सादय) = [आसादय] प्राप्त कर।
Essence
हम हृदय को ऋत के द्वारा शुद्ध बनाएँ, मनन के द्वारा इसका धारण करें, इसे ब्रह्मौदन के लिए बनाई गई वेदि समझें। इसे शुद्ध व निष्पाप बनाकर प्रभु की उपासना करते हुए ज्ञान प्राप्त करें।
Subject
हृदयरूप वेदि