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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 11/1/2

10 Sukta
37 Mantra
11/1/2
Devata- ब्रह्मौदनः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- ब्रह्मौदन सूक्त
Mantra with Swara
कृ॑णु॒त धू॒मं वृ॑षणः सखा॒योऽद्रो॑घाविता॒ वाच॒मच्छ॑। अ॒यम॒ग्निः पृ॑तना॒षाट् सु॒वीरो॒ येन॑ दे॒वा अस॑हन्त॒ दस्यू॑न् ॥

कृ॒णु॒त । धू॒मम् । वृ॒ष॒ण॒: । स॒खा॒य॒: । अद्रो॑घऽअविता । वाच॑म् । अच्छ॑ । अ॒यम् । अ॒ग्नि: । पृ॒त॒ना॒षाट् । सु॒ऽवीर॑: । येन॑ । दे॒वा: । अस॑हन्त । दस्यु॑न् ॥१.२॥

Mantra without Swara
कृणुत धूमं वृषणः सखायोऽद्रोघाविता वाचमच्छ। अयमग्निः पृतनाषाट् सुवीरो येन देवा असहन्त दस्यून् ॥

कृणुत । धूमम् । वृषण: । सखाय: । अद्रोघऽअविता । वाचम् । अच्छ । अयम् । अग्नि: । पृतनाषाट् । सुऽवीर: । येन । देवा: । असहन्त । दस्युन् ॥१.२॥

Meaning
१. हे (वृषण:) = अपने में शक्ति का सेचन करनेवाले, (सखायः) = परस्पर प्रेम से चलनेवाले लोगो ! तुम (धूमं कृणुत) = ऐसे सन्तान को जन्म दो जो शत्रुओं को कम्पित करनेवाला हो [धूञ् कम्पने], (अद्रोघ अविता) = द्रोहशून्य व रक्षा करनेवाला हो। (वाचम् अच्छ) = वेदवाणी की ओर चलनेवाला हो। उत्तम सन्तान को जन्म देने के लिए आवश्यक है कि हम शक्ति का शरीर में ही सेचन करें तथा परस्पर प्रेम [सखित्व] से वर्ते। इसप्रकार हम नौरोग व निद्वेष होंगे तो हमारी सन्तान भी उत्तम होंगे। २. (अयम्) = यह (सन्तान अग्नि:) = प्रगतिशील होता है, (पृतनाषाट्) = शत्रुसैन्य का मर्षण करनेवाला होता है, (सुवीर:) = उत्तम वीर होता है, (येन) = जिस सन्तान के द्वारा (देवा:) = देववृत्ति के पुरुष (दस्यून् असहन्त) = दस्युओं का पराभव करते हैं, अर्थात् घरों में दास्यव वृत्तियों को नहीं पनपने देते। सन्तान उत्तम हों, तो घर उत्तम बने रहते हैं।
Essence
हम अपने में शक्ति का सेचन करनेवाले व परस्पर निद्वेषतावाले बनें तो हमारी सन्तान 'शत्रुओं को कम्पित करनेवाली, द्रोहशून्य, रक्षणात्मक वृत्तिवाली, ज्ञानरूचि, प्रगतिशील, शत्रुसैन्यसंहारक व सुवीर' होगी। इन सन्तानों से हमारे घरों में कभी दास्यव वृत्तियों का प्रवेश नहीं होगा।
Subject
धूम-सुवीर

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