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Atharvaveda - Mantra 40

Atharvaveda 10/8/40

10 Sukta
44 Mantra
10/8/40
Devata- आत्मा Rishi- कुत्सः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- ज्येष्ठब्रह्मवर्णन सूक्त
Mantra with Swara
अ॒प्स्वासीन्मात॒रिश्वा॒ प्रवि॑ष्टः॒ प्रवि॑ष्टा दे॒वाः स॑लि॒लान्या॑सन्। बृ॒हन्ह॑ तस्थौ॒ रज॑सो वि॒मानः॒ पव॑मानो ह॒रित॒ आ वि॑वेश ॥

अ॒प्ऽसु । आ॒सी॒त् । मा॒त॒रिश्वा॑ । प्रऽवि॑ष्ट: । प्रऽवि॑ष्टा: । दे॒वा: । स॒लि॒लान‍ि॑ । आ॒स॒न् । बृ॒हन् । ह॒ । त॒स्थौ॒ । रज॑स: । वि॒ऽमान॑: । पव॑मान: । ह॒रित॑: । आ । वि॒वे॒श॒ ॥८.४०॥

Mantra without Swara
अप्स्वासीन्मातरिश्वा प्रविष्टः प्रविष्टा देवाः सलिलान्यासन्। बृहन्ह तस्थौ रजसो विमानः पवमानो हरित आ विवेश ॥

अप्ऽसु । आसीत् । मातरिश्वा । प्रऽविष्ट: । प्रऽविष्टा: । देवा: । सलिलान‍ि । आसन् । बृहन् । ह । तस्थौ । रजस: । विऽमान: । पवमान: । हरित: । आ । विवेश ॥८.४०॥

Meaning
१. प्रलय के समय सब कार्यजगत् नष्ट होकर कारणरूप में चला जाता है, यह कारणरूप प्रकृति ही आपः' कहलाती है-सर्वत्र एक समान [साम्यावस्था] फैला हुआ तत्त्व। यही 'सलिल' कहलाती है [सत् लीनम् अस्मिन्]-जिसमें यह सब दृश्य [सत्] जगत् लीन हो जाता है। (मातरिश्वा) = वह (सूत्रात्मा अप्सु) = इस एक-समान फैले हुए परमाणुरूप प्रकृतितत्व में (प्रविष्टः आसीत्) = प्रविष्ट हुआ-हुआ था। (देवा:) = सूर्य आदि सब देव भी (सलिलानि) = इन सलिलों में ही-कारणभूत परमाणुओं में ही (प्रविष्टाः आसन्) = प्रविष्ट हुए-हुए थे। २. उस समय (ह) = निश्चय से (बृहन्) = महान् प्रभु (ह) = ही (रजस: विमान:) = सब लोकों का वि-मान-कारणरूप में अलग-अलग करनेवाला-[निर्माण से विपरीत विमान करनेवाला] (तस्थौ) = स्थित था। यह (पवमानः) = पवित्रीकरणवाला [सब ब्रह्माण्ड का सफाया कर देनेवाला] प्रभु (हरित:) = सब दिशाओं में (आविवेश) = प्रविष्ट हो रहा था। उस समय चारों ओर प्रभु-ही-प्रभु थे-अन्य कोई सत्ता प्रतीत न होती थी।
Essence
प्रलय के समय प्रभु कारणरूप व्यापक परमाणुओं में प्रविष्ट थे। सूर्यादि ये सब देव भी कारणरूप परमाणुओं में चले गये थे। एक प्रभु ही इस ब्रह्माण्ड का विमान [Disman tling] करते हुए स्थित थे। वे सफाया कर देनेवाले प्रभु ही सब ओर विद्यमान थे।
Subject
'बृहन् पवमानः' प्रभु

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