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Atharvaveda - Mantra 30

Atharvaveda 10/8/30

10 Sukta
44 Mantra
10/8/30
Devata- आत्मा Rishi- कुत्सः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Suktam- ज्येष्ठब्रह्मवर्णन सूक्त
Mantra with Swara
ए॒षा स॒नत्नी॒ सन॑मे॒व जा॒तैषा पु॑रा॒णी परि॒ सर्वं॑ बभूव। म॒ही दे॒व्युषसो॑ विभा॒ती सैके॑नैकेन मिष॒ता वि च॑ष्टे ॥

ए॒षा । स॒नत्नी॑ । सन॑म् । ए॒व । जा॒ता । ए॒षा । पु॒रा॒णी । परि॑ । सर्व॑म् । ब॒भू॒व॒ । म॒ही । दे॒वी । उ॒षस॑: । वि॒ऽभा॒ती । सा । एके॑नऽएकेन । मि॒ष॒ता । वि । च॒ष्टे॒ ॥८.३०॥

Mantra without Swara
एषा सनत्नी सनमेव जातैषा पुराणी परि सर्वं बभूव। मही देव्युषसो विभाती सैकेनैकेन मिषता वि चष्टे ॥

एषा । सनत्नी । सनम् । एव । जाता । एषा । पुराणी । परि । सर्वम् । बभूव । मही । देवी । उषस: । विऽभाती । सा । एकेनऽएकेन । मिषता । वि । चष्टे ॥८.३०॥

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Meaning
१. (एषा) = यह प्रभु-शक्ति (सनत्नी) = [सन् संभक्ती, नी] सम्भजनशील पुरुषों का प्रणयन [आगे ले-चलना] करनेवाली (सनम् एव) = जाता-सदा से ही प्रसिद्ध है। (एषा पुराणी) = यह सनातन काल से चली आ रही शक्ति (सर्वं परिबभूव) = सबको व्याप्त किये हुए है। २. (सा मही) = वह महनीय [ पूजनीय] (देवी) = प्रकाशमयी शक्ति (उषस:) = उषाकालों को (विभाती) = प्रकाशित करती हुई (एकेन एकेन मिषता) = प्रत्येक निमेषोन्मेषवाले प्राणी के द्वारा विचष्टे-देखती है। सब प्राणियों को दर्शन आदि की शक्ति प्राप्त करानेवाली वह 'सनत्नी पुराणी' शक्ति ही है।
Essence
प्रभु-शक्ति ही भक्तों का प्रणयन करनेवाली है, यही सबमें व्याप्त हो रही है। यही उषाकालों को प्रकाशित करती है-यही सब प्राणियों को दर्शनादि की शक्ति देती है।
Subject
सनत्नी-पुराणी