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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 10/8/3

10 Sukta
44 Mantra
10/8/3
Devata- आत्मा Rishi- कुत्सः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- ज्येष्ठब्रह्मवर्णन सूक्त
Mantra with Swara
ति॒स्रो ह॑ प्र॒जा अ॑त्या॒यमा॑य॒न्न्यन्या अ॒र्कम॒भितो॑ऽविशन्त। बृ॒हन्ह॑ तस्थौ॒ रज॑सो वि॒मानो॒ हरि॑तो॒ हरि॑णी॒रा वि॑वेश ॥

ति॒स्र: । ह॒ । प्र॒ऽजा: । अ॒ति॒ऽआ॒यम् । आ॒य॒न् । नि । अ॒न्या: । अ॒र्कम्‌ । अ॒भित॑: । अ॒वि॒श॒न्त॒ । बृ॒हन् । ह॒ । त॒स्थौ॒ । रज॑स: । वि॒ऽमान॑: । हरि॑त: । हरि॑णी: । आ । वि॒वे॒श॒ ॥८.३॥

Mantra without Swara
तिस्रो ह प्रजा अत्यायमायन्न्यन्या अर्कमभितोऽविशन्त। बृहन्ह तस्थौ रजसो विमानो हरितो हरिणीरा विवेश ॥

तिस्र: । ह । प्रऽजा: । अतिऽआयम् । आयन् । नि । अन्या: । अर्कम्‌ । अभित: । अविशन्त । बृहन् । ह । तस्थौ । रजस: । विऽमान: । हरित: । हरिणी: । आ । विवेश ॥८.३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (तिस्त्रः प्रजा:) = 'सात्त्विक, राजस् व तामस्' स्वभाववाली प्रजाएँ (ह अति आयम् आयन) = निश्चय से अत्यधिक[ बारम्बार] आवागमन को प्राप्त होती है, परन्तु (अन्याः) = इनसे भिन्न  गुणातीत स्थितिवाली [नित्यसत्त्वस्थ] प्रजाएँ (अर्कम् अभितः नि अविशन्त) = उस पूजनीय प्रभु के समीप स्थित होती हैं। २. वे प्रभु (ह) = निश्चय से (बृहन्) = महान होते हुए, (रजसः विमान:) = लोकों को विशेष मानपूर्वक बनाते हुए (तस्थौ) = स्थित हैं, वे (हरित:) = सूर्यसम दीप्तिवाले प्रभु (हरिणी:) = समस्त दिशाओं में (आविवेश) = प्रविष्ट हो रहे है। वस्तुत: उस तेजोदीप्त प्रभु की दीप्ति से ही सब पिण्ड दीस होते हैं ('तस्य भासा सर्वमिदं विभाति')
Essence
गुणों से बद्ध प्रजाएँ आवागमन के चक्र में चलती हैं। गुणातीत व्यक्ति प्रभु के समीप स्थित होते हैं। वे महान् प्रभु सब लोक-लोकान्तरों का निर्माण करके उनमें स्थित हो रहे हैं।
Subject
गुणातीत की प्रभु के समीप स्थिति