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Atharvaveda - Mantra 21

Atharvaveda 10/8/21

10 Sukta
44 Mantra
10/8/21
Devata- आत्मा Rishi- कुत्सः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- ज्येष्ठब्रह्मवर्णन सूक्त
Mantra with Swara
अ॒पादग्रे॒ सम॑भव॒त्सो अग्रे॒ स्वराभ॑रत्। चतु॑ष्पाद्भू॒त्वा भोग्यः॒ सर्व॒माद॑त्त॒ भोज॑नम् ॥

अ॒पात् । अग्रे॑ । सम् । अ॒भ॒व॒त् । स: । अग्रे॑ । स्व᳡: । आ । अ॒भ॒र॒त् । चतु॑:ऽपात् । भू॒त्वा । भोग्य॑: । सर्व॑म् । आ । अ॒द॒त्त॒ । भोजन॑म् ॥८.२१॥

Mantra without Swara
अपादग्रे समभवत्सो अग्रे स्वराभरत्। चतुष्पाद्भूत्वा भोग्यः सर्वमादत्त भोजनम् ॥

अपात् । अग्रे । सम् । अभवत् । स: । अग्रे । स्व: । आ । अभरत् । चतु:ऽपात् । भूत्वा । भोग्य: । सर्वम् । आ । अदत्त । भोजनम् ॥८.२१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (अग्ने) = सृष्टि के पूर्व (सः) = वे परम पुरुष 'प्रभु' (अपात्) = [अ, पद् गतौ] अविशेषरूप 'अमात्र' स्वरूप (सम् अभवत्) = थे। वे प्रभु (अग्रे) = सृष्टि की उत्पत्ति से पूर्व (स्वः आभरत्) = प्रकाशमय रूप को धारण करते थे। २. सृष्टि के होने पर वे प्रभु (चतुष्पात् भूत्वा) = 'प्रकाशवान्' 'अनन्तवान्, ज्योतिष्मान् व आयतनवान्' रूप चारों पादोंवाले होकर (भोग्य:) =  भोगने में उत्तम वे प्रभु (सर्वं भोजनम् आदत्त) = सारे ब्रह्माण्ड को भोजन के रूप में ग्रहण कर लेते हैं। ('अत्ता चराचर ग्रहणात्') = चर-अचर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपने में लेने से वे 'अत्ता' कहलाते हैं। इसप्रकार सारे ब्रह्माण्ड को कोई भी अन्य अपना भोजन नहीं बना पाता एवं वे प्रभु'भोक्ता हैं।
Essence
सृष्टि से पूर्व प्रभु 'अमात्र' के रूप में हैं। वे प्रकाश का पोषण किये हुए हैं। सृष्टि में वे प्रभु चतुष्पाद् होकर-'प्रकाशवान्, अनन्तवान्, ज्योतिष्मान् व आयतनवान्' होकर सारे ब्राह्माण्ड को भोजन के रूप में लील लेनेवाले सर्वोत्तम भोक्ता हैं।
Subject
अत्ता चराचग्रहणात्