Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 26

Atharvaveda 10/7/26

10 Sukta
44 Mantra
10/7/26
Devata- स्कन्धः, आत्मा Rishi- अथर्वा, क्षुद्रः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- सर्वाधारवर्णन सूक्त
Mantra with Swara
यत्र॑ स्क॒म्भः प्र॑ज॒नय॑न्पुरा॒णं व्यव॑र्तयत्। एकं॒ तदङ्गं॑ स्क॒म्भस्य॑ पुरा॒णम॑नु॒संवि॑दुः ॥

यत्र॑ । स्क॒म्भ: । प्र॒ऽज॒नय॑न् । पु॒रा॒णम् । वि॒ऽअव॑र्तयत् । एक॑म् । तत् । अङ्ग॑म् । स्क॒म्भस्य॑ । पु॒रा॒णम् । अ॒नु॒ऽसंवि॑दु: ॥७.२६॥

Mantra without Swara
यत्र स्कम्भः प्रजनयन्पुराणं व्यवर्तयत्। एकं तदङ्गं स्कम्भस्य पुराणमनुसंविदुः ॥

यत्र । स्कम्भ: । प्रऽजनयन् । पुराणम् । विऽअवर्तयत् । एकम् । तत् । अङ्गम् । स्कम्भस्य । पुराणम् । अनुऽसंविदु: ॥७.२६॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१. (यत्र) = जहाँ (स्कम्भ:) = वे सर्वांधार प्रभु (प्रजनयन्) = इस सृष्टि की उत्पत्ति के हेत से (पुराणम्) = प्रवाहरूप से सनातन प्रधान [प्रकृति] को (व्यवर्तयत्) = निवृत्त करते हैं-विविध रूपों में परिवर्तित करते हैं। वहाँ ज्ञानी पुरुष (तत् पुराणम्) = उस सनातन प्रधान को (स्कम्भस्य) = उस सर्वाधार प्रभु का ही (एकं अङ्गम्) = एक अङ्ग (अनुसंविदुः) = अनुसन्धान करते हुए सम्यक् जानते हैं। इस प्रधान [Matter] का भी अन्तिम स्वरूप सामर्थ्य-शक्ति [energy] ही है और यह सामर्थ्य प्रभु का ही तो अङ्ग है-गुण है।
Essence
प्रकृति' कभी विकृति के रूप में और कभी फिर प्रकृति के रूप में चली आती हुई 'पुराण' [सन्तान] है। प्रभु इसी का विवर्तन करते हुए सृष्टि को जन्म देते हैं। यह पुराण प्रकृति भी अन्तत: सामर्थ्य के रूप में होती हुई उस प्रभु का ही एक अङ्ग है।
Subject
स्कम्भ का एक अङ्ग 'पुराण'