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Atharvaveda - Mantra 43

Atharvaveda 10/5/43

10 Sukta
50 Mantra
10/5/43
Devata- प्रजापतिः Rishi- सिन्धुद्वीपः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- विजय प्राप्ति सूक्त
Mantra with Swara
वै॑श्वान॒रस्य॒ दंष्ट्रा॑भ्यां हे॒तिस्तं सम॑धाद॒भि। इ॒यं तं प्सा॒त्वाहु॑तिः स॒मिद्दे॒वी सही॑यसी ॥

वै॒श्वा॒न॒रस्य॑ । दंष्ट्रा॑भ्याम् । हे॒ति: । तम् । सम् । अ॒धा॒त् । अ॒भि । इ॒यम् । तम् । प्सा॒तु॒ । आऽहु॑ति: । स॒म्ऽइत् । दे॒वी । सही॑यसी ॥५.४३॥

Mantra without Swara
वैश्वानरस्य दंष्ट्राभ्यां हेतिस्तं समधादभि। इयं तं प्सात्वाहुतिः समिद्देवी सहीयसी ॥

वैश्वानरस्य । दंष्ट्राभ्याम् । हेति: । तम् । सम् । अधात् । अभि । इयम् । तम् । प्सातु । आऽहुति: । सम्ऽइत् । देवी । सहीयसी ॥५.४३॥

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Meaning
१. प्रात:-सायं प्रभु की उपासना ही प्रभु की दो दंष्ट्राएँ हैं। जो भी इस उपासना को अपनाता है उसके लिए यह उपासना शत्रु-नाशन का आयुध बन जाती है। यह (हेति:) = शत्रुनाशन के लिए वन (वैश्वानरस्य दंष्ट्राभ्याम्) = सर्वहितकारी प्रभु की दो दाढ़ों से [प्रात:-सायं की जानेवाली उपासना से] (तम्) = उस शत्रु को (सम् अभि अधात्) = सम्यक् सब ओर से पकड़ ले [दबोच ले]। प्रात:-सायं प्रभु का उपासन हमें शत्रुओं से रक्षा का सामर्थ्य प्राप्त कराता है। २. (इयम्) = यह (देवी) = रोगों को जीतने की कामनावाली (सहीयसी) = रोगरूप शत्रुओं के मर्षण में उत्तम (समित्) = अग्निहोत्र में पड़नेवाली समिधा व (आहुति:) = हव्य पदार्थ (तं प्सातु) = उस रोगरूप शत्रु को खा जाए। अग्निहोत्र के द्वारा रोगों का विनाश हो जाता है ('अग्नेहोंनेण प्रणुदा सपत्नान्')
Essence
प्रात:-सायं प्रभु का उपासन करते हुए हम शत्रुओं को परास्त करें। अग्निहोत्र द्वारा रोगों को दूर भगानेवाले हों।
Subject
'देवी सहीयसी' आहुतिः