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Atharvaveda - Mantra 9

Atharvaveda 10/4/9

10 Sukta
26 Mantra
10/4/9
Devata- तक्षकः Rishi- गरुत्मान् Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- सर्पविषदूरीकरण सूक्त
Mantra with Swara
अ॑र॒सास॑ इ॒हाह॑यो॒ ये अन्ति॒ ये च॑ दूर॒के। घ॒नेन॑ हन्मि॒ वृश्चि॑क॒महिं॑ द॒ण्डेनाग॑तम् ॥

अ॒र॒सास॑: । इ॒ह । अह॑य: । ये । अन्ति॑ । ये । च॒ । दू॒र॒के । घ॒नेन॑ । ह॒न्मि॒ । वृश्चि॑कम् । अहि॑म् । द॒ण्डेन॑ । आऽग॑तम् ॥४.९॥

Mantra without Swara
अरसास इहाहयो ये अन्ति ये च दूरके। घनेन हन्मि वृश्चिकमहिं दण्डेनागतम् ॥

अरसास: । इह । अहय: । ये । अन्ति । ये । च । दूरके । घनेन । हन्मि । वृश्चिकम् । अहिम् । दण्डेन । आऽगतम् ॥४.९॥

Meaning
१. (इह) = इस संसार-क्षेत्र में (ये अहयः) = जो हिंसक तत्त्व (अन्ति) = हमारे समीप हैं, (ये च) = और जो (दूरके) = दूर हैं, वे सब (अरसास:) = नीरस व निर्बल हो जाएँ। (आगतं वृश्चिकम्) = समीप आये हुए बिच्छु को (घनेन हन्मि) = घन से नष्ट करता हूँ तथा (अहिम्) = सर्प को (दण्डेन) = डण्डे से मारता हूँ|
Essence
सर्प व बिच्छु स्वभाववाले पुरुषों को दण्डित करना आवश्यक ही है। प्रजा रक्षण के लिए इन्हें नष्ट करना अनिवार्य है।
Subject
वृश्चिक, अहि
Information
वृश्चिक को घन से, सर्प को डण्डे से आहत करने का स्वारस्य चिन्त्य है।

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