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Atharvaveda - Mantra 19

Atharvaveda 10/4/19

10 Sukta
26 Mantra
10/4/19
Devata- तक्षकः Rishi- गरुत्मान् Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- सर्पविषदूरीकरण सूक्त
Mantra with Swara
सं हि शी॒र्षाण्यग्र॑भं पौञ्जि॒ष्ठ इ॑व॒ कर्व॑रम्। सिन्धो॒र्मध्यं॑ प॒रेत्य॒ व्यनिज॒महे॑र्वि॒षम् ॥

सम् । हि । शी॒र्षाणि॑ । अग्र॑भम् । पौ॒ञ्जि॒ष्ठ:ऽइ॑व । कर्व॑रम् । सिन्धो॑: । मध्य॑म् । प॒रा॒ऽइत्य॑ । वि । अ॒नि॒ज॒म् । अहे॑: । वि॒षम् ॥४.१९॥

Mantra without Swara
सं हि शीर्षाण्यग्रभं पौञ्जिष्ठ इव कर्वरम्। सिन्धोर्मध्यं परेत्य व्यनिजमहेर्विषम् ॥

सम् । हि । शीर्षाणि । अग्रभम् । पौञ्जिष्ठ:ऽइव । कर्वरम् । सिन्धो: । मध्यम् । पराऽइत्य । वि । अनिजम् । अहे: । विषम् ॥४.१९॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. गतमन्त्र में काम, क्रोध, लोभ' आदि असुरों को अहि [हिंसिका वृत्ति] का जनिता कहा था। यहाँ कहते हैं कि मैं हि-निश्चय से इन आसुरवृत्तियों के (शीर्षाणि सम् अग्रभम्) = सिरों को सम्यक् पकड़ लेता हूँ-इनके सिरों को कुचल डालता हूँ। इसप्रकार इन्हें पकड़ लेता हूँ, (इव) = जैसेकि (पौञ्जिष्ठः) = [प्र ओजिष्ठ:] प्रकृष्ट तेजस्वी पुरुष (कर्वरम्) = एक चीते [Tiger] को पकड़ लेता है। २. मैं (सिन्धोः मध्यं परेत्य) = ज्ञान-समुद्र के मध्य में दूर तक जाकर-ज्ञान-समुद्र में स्नान करता हुआ-(अहेः विषम्) = हिंसकवृत्ति के विष को-विषैले प्रभाव को-(व्यनिजम्) = धो डालता हूँ। ज्ञान-जल में स्नान करता हुआ मैं हिंसावृत्ति से ऊपर उठता हूँ।
Essence
इम काम, क्रोध, लोभ आदि आसुरवृत्तियों को कुचल दें और ज्ञान का सम्पादन करते हुए हिंसावृत्ति के ऊपर उठें।
Subject
सिन्धोः मध्यं परेत्य