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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 10/2/5

10 Sukta
33 Mantra
10/2/5
Devata- ब्रह्मप्रकाशनम्, पुरुषः Rishi- नारायणः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- ब्रह्मप्रकाशन सूक्त
Mantra with Swara
को अ॑स्य बा॒हू सम॑भरद्वी॒र्यं करवा॒दिति॑। अंसौ॒ को अ॑स्य॒ तद्दे॒वः कुसि॑न्धे॒ अध्या द॑धौ ॥

क: । अ॒स्य॒ । बा॒हू इति॑ । सम् । अ॒भ॒र॒त् । वी॒र्य᳡म् । क॒र॒वा॒त् । इति॑ । अंसौ॑ । क: । अ॒स्‍य॒ । तत् । दे॒व: । कुसि॑न्धे । अधि॑ । आ । द॒धौ॒ ॥२.५॥

Mantra without Swara
को अस्य बाहू समभरद्वीर्यं करवादिति। अंसौ को अस्य तद्देवः कुसिन्धे अध्या दधौ ॥

क: । अस्य । बाहू इति । सम् । अभरत् । वीर्यम् । करवात् । इति । अंसौ । क: । अस्‍य । तत् । देव: । कुसिन्धे । अधि । आ । दधौ ॥२.५॥

Meaning
१. (क:) = किस अद्भुत रचयिता ने (अस्य) = इस पुरुष की (बाहू समभरत्) = भुजाओं को संभृत किया है, (वीर्यं करवात् इति) = जिससे यह वीरतापूर्ण कर्मों को करनेवाला बनता है, (तत्) = उसी कर्तव्य-भार को उठाने के उद्देश्य से ही (कः देव:) = किस दिव्य स्रष्टा ने (अस्य कुसिन्धे अधि) = इस पुरुष के धड़ पर (अंसौ आदधौ) = कन्धों को स्थापित किया है।
Essence
भुजाएँ शक्तिशाली कर्मों को करने के लिए दी गई हैं और कन्धे कर्तव्यभार को उठाने के लिए प्राप्त कराये गये हैं। हम कर्तव्यभार से घबराएँ नहीं, अपितु वीरता के साथ कर्म करनेवाले बनें।
Subject
बाहू-अंसौ

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