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Atharvaveda - Mantra 23

Atharvaveda 10/2/23

10 Sukta
33 Mantra
10/2/23
Devata- ब्रह्मप्रकाशनम्, पुरुषः Rishi- नारायणः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- ब्रह्मप्रकाशन सूक्त
Mantra with Swara
ब्रह्म॑ दे॒वाँ अनु॑ क्षियति॒ ब्रह्म॒ दैव॑जनी॒र्विशः॑। ब्रह्मे॒दम॒न्यन्नक्ष॑त्रं॒ ब्रह्म॒ सत्क्ष॒त्रमु॑च्यते ॥

ब्रह्म॑ । दे॒वान् । अनु॑ । क्षि॒य॒ति॒ । ब्रह्म॑ । दैव॑ऽजनी: । विश॑: । ब्रह्म॑ । इ॒दम् । अ॒न्यत् । नक्ष॑त्रम् । ब्रह्म॑ । सत् । क्ष॒त्रम् । उ॒च्य॒ते॒ ॥२.२३॥

Mantra without Swara
ब्रह्म देवाँ अनु क्षियति ब्रह्म दैवजनीर्विशः। ब्रह्मेदमन्यन्नक्षत्रं ब्रह्म सत्क्षत्रमुच्यते ॥

ब्रह्म । देवान् । अनु । क्षियति । ब्रह्म । दैवऽजनी: । विश: । ब्रह्म । इदम् । अन्यत् । नक्षत्रम् । ब्रह्म । सत् । क्षत्रम् । उच्यते ॥२.२३॥

Meaning
१. (केन) = किस सामर्थ्य से मनुष्य (देवान् अनु क्षियति) = देवों के साथ निवास करता है दिव्य गुणों को अपने में बढ़ानेवाला बनता है ? (केन) = किस सामर्थ्य से (दैवजनी: विश:) = प्रभु से उत्पादित प्रजाओं के साथ अनुकूलता से निवास कर पाता है ? (केन अन्यत्) = किससे भिन्न रहित होकर (इदम्) = यह (न-क्षत्रम्) = क्षतों से अपना त्राण करनेवाला नहीं होता, और (केन = -किसके द्वारा (सत् क्षत्रम्) = उत्तम बलस्वरूप [क्षत्रों से अपना त्राण करनेवाला] (उच्यते) = कहा जाता है। २. (ब्रह्म देवान् अनु क्षियति) = ज्ञान से यह पुरुष देवों के साथ निवास करता है। (ब्रह्म दैवजनी: विशः) [अनुक्षियति] = ज्ञान द्वारा देव से उत्पादित प्रजाओं के साथ अनुकूलता से निवास करता है। (ब्रह्म अन्यत्) = ब्रह्म से रहित (इदं नक्षत्रम्) = यह निर्वीर्य है। (ब्रह्म) = ज्ञान ही (सत् क्षत्रम्) = उत्तम बल (उच्यते) = कहा जाता है।
Essence
ज्ञान से दिव्यगुणों का विकास होता है। ज्ञान से मनुष्य सब प्रजाओं के साथ अनुकूलतापूर्वक निवास करता है। ज्ञानशून्यता ही निर्वीर्यता है। ज्ञान ही उत्कृष्ट बल है।
Subject
न-क्षत्रं-सत् क्षत्रम्

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