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Atharvaveda - Mantra 30

Atharvaveda 10/10/30

10 Sukta
34 Mantra
10/10/30
Devata- वशा Rishi- कश्यपः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- वशागौ सूक्त
Mantra with Swara
व॒शा द्यौर्व॒शा पृ॑थि॒वी व॒शा विष्णुः॑ प्र॒जाप॑तिः। व॒शाया॑ दु॒ग्धम॑पिबन्त्सा॒ध्या वस॑वश्च ये ॥

व॒शा । द्यौ: । व॒शा । पृ॒थि॒वी । व॒शा । विष्णु॑: । प्र॒जाऽप॑ति: । व॒शाया॑: । दु॒ग्धम् । अ॒पि॒ब॒न् । सा॒ध्या: । वस॑व: । च॒ । ये ॥१०.३०॥

Mantra without Swara
वशा द्यौर्वशा पृथिवी वशा विष्णुः प्रजापतिः। वशाया दुग्धमपिबन्त्साध्या वसवश्च ये ॥

वशा । द्यौ: । वशा । पृथिवी । वशा । विष्णु: । प्रजाऽपति: । वशाया: । दुग्धम् । अपिबन् । साध्या: । वसव: । च । ये ॥१०.३०॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (वशा) = यह वेदधेनु ही (द्यौः) = द्युलोक है, (वशा पृथिवी) = यह वेदधेनु ही पृथिवीलोक है, अर्थात् यह वेदधेनु ही धुलोक से पृथिवीलोक तक सब पदार्थों का ज्ञान देनेवाली है। (वशा) = यह वेदधेनु ही (विष्णु:) = प्रत्येक पदार्थ में व्याप्त (प्रजापति:) = प्रजाओं का रक्षक प्रभु है। यह वेदवाणी प्रत्येक पदार्थ में प्रभु की सत्ता व महिमा का दर्शन कराती है। २. (वशाया:) = इस वेदधेनु के (दुग्धम्) = ज्ञानदुग्ध को वे ही पीते हैं (ये) = जो (साध्या:) = साधना में प्रवृत्त (च) = और (वसव:) = अपने निवास को उत्तम बनानेवाले हैं। वस्तुत: बशा के दुग्धपान का ही यह परिणाम होता है कि हम साधनामय जीवनवाले व उत्तम निवासवाले बनते हैं। इसके दुग्ध का पान करनेवाला व्यक्ति सर्वत्र प्रभु की महिमा को देखता है।
Essence
यह कमनीया वेदवाणी हमें सब पदार्थों का ज्ञान देती है-सब पदार्थों में प्रभु की व्याप्ति व महिमा का दर्शन कराती है, इसप्रकार यह हमारे जीवनों को साधनामय व उत्तम निवासवाला करती है।
Subject
साध्या: वसवः द्यौः