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Atharvaveda - Mantra 29

Atharvaveda 10/10/29

10 Sukta
34 Mantra
10/10/29
Devata- वशा Rishi- कश्यपः Chhanda- त्रिपदा विराड्गायत्री Suktam- वशागौ सूक्त
Mantra with Swara
च॑तु॒र्धा रेतो॑ अभवद्व॒शायाः॑। आप॒स्तुरी॑यम॒मृतं॒ तुरी॑यं य॒ज्ञस्तुरी॑यं प॒शव॒स्तुरी॑यम् ॥

च॒तु॒:ऽधा । रेत॑: । अ॒भ॒व॒त् । व॒शाया॑: । आप॑: । तुरी॑यम् । अ॒मृत॑म् । तुरी॑यम् । य॒ज्ञ: । तुरी॑यम् । प॒शव॑: । तुरी॑यम् ॥१०.२९॥

Mantra without Swara
चतुर्धा रेतो अभवद्वशायाः। आपस्तुरीयममृतं तुरीयं यज्ञस्तुरीयं पशवस्तुरीयम् ॥

चतु:ऽधा । रेत: । अभवत् । वशाया: । आप: । तुरीयम् । अमृतम् । तुरीयम् । यज्ञ: । तुरीयम् । पशव: । तुरीयम् ॥१०.२९॥

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Meaning
१. (वशाया:) = इस वेदवाणी की (रेत:) = सन्तान [Progeny]-प्रजा-(चतुर्धा अभवत्) = चार प्रकार की होती है। (आपः तुरीयम्) = एक चौथाई तो कर्मों में व्याप्त रहनेवाले नर हैं [आप् व्याती]-वेदवाणी मनुष्यों को यही प्रेरणा देती है कि ('कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतर समाः') = कर्म करते हुए ही सौ वर्ष तक जीने की कामना करो। (तुरीयम्) = वशा का एक चौथाई रेतस् (अमृतम्) = नीरोगता है। वेद मनुष्य को वाचस्पति बनकर नीरोग बनने का उपदेश देता है। २. (तुरीयम्) = वेद का तृतीय तुरीयांश (यज्ञ:) = यज्ञ है। वह सविता देव मनुष्य को इन यज्ञों के लिए ही निरन्तर प्रेरित कर रहा है। (पशवः तुरीयम्) = वेद का चतुर्थ रेतस् पशु है ('तवेमे पञ्च पशव: गौरश्वः पुरुषोऽजावयः') = इस मन्त्र भाग द्वारा गौ, अश्व, अजा, अवि आदि पशुओं को मानव जीवन के साथ जोड़ दिया गया है। ('दोग्धी धेनुवोंढाउनड्वान् आशुः सप्ति:') = आदि शब्दों द्वारा उत्तम धेनुओं, बैलों व घोड़ों के लिए निर्देश हुआ है।
Essence
वेदवाणी मनुष्य को "क्रियाशील जीवनवाला, नीरोग, यज्ञशील व उत्तम गौ आदि पशुओंवाला' बनने की प्रेरणा देती है।
Subject
आपः अमृतं यज्ञः पशवः