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Atharvaveda - Mantra 28

Atharvaveda 10/10/28

10 Sukta
34 Mantra
10/10/28
Devata- वशा Rishi- कश्यपः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- वशागौ सूक्त
Mantra with Swara
ति॒स्रो जि॒ह्वा वरु॑णस्या॒न्तर्दी॑द्यत्या॒सनि॑। तासां॒ या मध्ये॒ राज॑ति॒ सा व॒शा दु॑ष्प्रति॒ग्रहा॑ ॥

ति॒स्र: । जि॒ह्वा: । वरु॑णस्य । अ॒न्त: । दी॒द्य॒ति॒ । आ॒सनि॑ । तासा॑म् । या । मध्ये॑ । राज॑ति । सा । व॒शा । दु॒:ऽप्र॒ति॒ग्रहा॑ ॥१०.२८॥

Mantra without Swara
तिस्रो जिह्वा वरुणस्यान्तर्दीद्यत्यासनि। तासां या मध्ये राजति सा वशा दुष्प्रतिग्रहा ॥

तिस्र: । जिह्वा: । वरुणस्य । अन्त: । दीद्यति । आसनि । तासाम् । या । मध्ये । राजति । सा । वशा । दु:ऽप्रतिग्रहा ॥१०.२८॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (वरुणस्य) = पापों का निवारण करनेवाले प्रभु के (आसनि अन्त:) = मुख में (तिस्त्र: जिह्वा) = तीन जिहाएँ (दीद्यति) = चमकती हैं।('तिस्त्रो वाच उदीरते गावो मिमन्ति धेनवः।हरिरति कनिक्रदत्') ॥ प्रभु गर्जना करते हुए हमारे समीप प्राप्त होते हैं, वे तीन वाणियों का उच्चारण करते हुए आते है। वे वाणियाँ ही 'ऋग, यजुः व साम' हैं।'ऋग' विज्ञान है, 'यजु'कर्म तथा 'साम' उपासना । २. (तासाम्) = उन वाणियों में (या) = जो (मध्ये राजति) = बीच में दीप्त होती है, (सा) = वह यजुः रूप वेदवाणी (दुष्प्रतिग्रहा) = ग्रहण करने में कठिन है। कर्म विज्ञानपूर्वक ही करने होते हैं और उन कों को प्रभु के प्रति अर्पण करने से ही प्रभु का उपासन होता है। इसप्रकार कर्म का महत्व स्पष्ट है। यही करने योग्य है, परन्तु है बड़ा कठिन ।
Essence
वरुण प्रभु की तीन वाणियों है 'ऋग, यजुः व साम'। इनमें श्रेष्ठतम कर्मरूप मध्य की वाणी कठिन है। कर्म करना सरल नहीं, परन्तु प्रभु का उपासन ज्ञानपूर्वक किये गये कर्मों से ही होता है।
Subject
ऋग, यजुः, साम में यजुः का दुष्पतिग्रहत्व