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Atharvaveda - Mantra 27

Atharvaveda 10/10/27

10 Sukta
34 Mantra
10/10/27
Devata- वशा Rishi- कश्यपः Chhanda- शङ्कुमत्यनुष्टुप् Suktam- वशागौ सूक्त
Mantra with Swara
य एवं॑ वि॒द्यात्स व॒शां प्रति॑ गृह्णी॒यात्। तथा॒ हि य॒ज्ञः सर्व॑पाद्दु॒हे दा॒त्रेऽन॑पस्फुरन् ॥

य: । ए॒वम् । वि॒द्यात् । स: । व॒शाम् । प्रति॑ । गृ॒ह्णी॒या॒त् । तथा॑ । हि । य॒ज्ञ: । सर्व॑ऽपात् । दु॒हे । दा॒त्रे । अन॑पऽस्फुरन् ॥१०.२७॥

Mantra without Swara
य एवं विद्यात्स वशां प्रति गृह्णीयात्। तथा हि यज्ञः सर्वपाद्दुहे दात्रेऽनपस्फुरन् ॥

य: । एवम् । विद्यात् । स: । वशाम् । प्रति । गृह्णीयात् । तथा । हि । यज्ञ: । सर्वऽपात् । दुहे । दात्रे । अनपऽस्फुरन् ॥१०.२७॥

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1 Bhashyas
Meaning
१.(य:) = जो (एवं विद्यात्) = इसप्रकार समझ लेता है कि इस वेदवाणी के द्वारा दिया गया ज्ञान हमें अमरता प्राप्त कराता है और यह हमें यज्ञों में प्रेरित करके देववृत्ति का बनाता है, (स:) = वह (वशां प्रतिगृह्णीयात्) = इस वेदधेनु को अवश्य प्राप्त करता ही है। २. (तथा) = वैसा करने पर वेद से यज्ञों की प्रेरणा लेकर जब हम यज्ञशील बनते हैं तब यह (यज्ञ:) = यज्ञ (हि) = निश्चय से (सर्वपाद्) = सब चरणोंवाला होता हुआ-विधिपूर्वक किया जाता हुआ-(अनपस्फुरम्) = [स्फुर संचलने] विचलित-विच्छिन्न न होता हुआ (दात्रे) = हवि देनेवाले इस यज्वा के लिए (दुहे) = सब कामनाओं का दोहन करता है। उस यज्वा के लिए यज्ञ कामधुक होता है।
Essence
वेदवाणी यज्ञों का प्रतिपादन करती है। ये यज्ञ अविच्छिन्नरूप से विधिपूर्वक होते हुए हमारी सब कामनाओं को पूर्ण करते हैं।
Subject
'सर्वपात् अनपस्फुरन्'