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Atharvaveda - Mantra 24

Atharvaveda 10/10/24

10 Sukta
34 Mantra
10/10/24
Devata- वशा Rishi- कश्यपः Chhanda- उपरिष्टाद्बृहती Suktam- वशागौ सूक्त
Mantra with Swara
युध॒ एकः॒ सं सृ॑जति॒ यो अ॑स्या॒ एक॒ इद्व॒शी। तरां॑सि य॒ज्ञा अ॑भव॒न्तर॑सां॒ चक्षु॑रभवद्व॒शा ॥

युध॑: । एक॑: । सम् । सृ॒ज॒ति॒ । य: । अ॒स्या॒: । एक॑: । इत् । व॒शी । तरां॑सि । य॒ज्ञा । अ॒भ॒व॒न् । तर॑साम् । चक्षु॑: । अ॒भ॒व॒त् । व॒शा ॥१०.२४॥

Mantra without Swara
युध एकः सं सृजति यो अस्या एक इद्वशी। तरांसि यज्ञा अभवन्तरसां चक्षुरभवद्वशा ॥

युध: । एक: । सम् । सृजति । य: । अस्या: । एक: । इत् । वशी । तरांसि । यज्ञा । अभवन् । तरसाम् । चक्षु: । अभवत् । वशा ॥१०.२४॥

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Meaning
१. (यः) = जो (अस्या:) = इस वेदधेनु का (एकः इत्) = निश्चय से अद्वितीय (वशी) = वश में करनेवाला होता है वह (एक:) = अकेला ही अपने जीवन में (युधः संसृजति) = 'काम, क्रोध, लोभ' से युद्ध करनेवाले 'प्रेम, करुणा व त्याग' रूप योद्धाओं को संसृष्ट करता है। जितना-जितना हम वेदज्ञान को प्राप्त करते हैं, उतना-उतना 'प्रेम, करुणा व त्याग' को विकसित करके, 'काम, क्रोध, लोभ' रूप शत्रुओं को विनष्ट कर पाते हैं। २. इस वशा [वेदधेनु] को वश में करनेवाले वशी के (यज्ञाः) = यज्ञ ही (तरांसि अभवन्) = बल होते हैं। इन (तरसाम्) = यज्ञरूप बलों की (चक्षुः) = प्रकाशिका वशा (अभवत्) = यह वेदधेनु ही होती है। वेद द्वारा उपदिष्ट यज्ञों को करते हुए हम शत्रुओं से अजय्य बन जाते हैं।
Essence
वेदधेनु को अपनानेवाला व्यक्ति अपने जीवन में 'प्रेम, करुणा व त्याग' को उत्पन्न करके 'काम, क्रोध, लोभ' को पराजित करनेवाला बनता है। इस वशी के यज्ञ ही बल होते हैं। इसके लिए इन यज्ञों की प्रकाशिका यह वशा है।
Subject
वशा-वशी