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Atharvaveda - Mantra 23

Atharvaveda 10/10/23

10 Sukta
34 Mantra
10/10/23
Devata- वशा Rishi- कश्यपः Chhanda- बृहती Suktam- वशागौ सूक्त
Mantra with Swara
सर्वे॒ गर्भा॑दवेपन्त॒ जाय॑मानादसू॒स्वः। स॒सूव॒ हि तामा॒हुर्व॒शेति॒ ब्रह्म॑भिः॒ क्लृप्तः स ह्यस्या॒ बन्धुः॑ ॥

सर्वे॑ । गर्भा॑त् । अ॒वे॒प॒न्त॒ । जाय॑मानात् । अ॒सू॒प्स्व᳡: । स॒सूव॑ । हि । ताम् । आ॒हु: । व॒शा । इति॑ । ब्रह्म॑ऽभि: । क्लृ॒प्त: । स: । हि । अ॒स्या॒: । बन्धु॑: ॥१०.२३॥

Mantra without Swara
सर्वे गर्भादवेपन्त जायमानादसूस्वः। ससूव हि तामाहुर्वशेति ब्रह्मभिः क्लृप्तः स ह्यस्या बन्धुः ॥

सर्वे । गर्भात् । अवेपन्त । जायमानात् । असूप्स्व: । ससूव । हि । ताम् । आहु: । वशा । इति । ब्रह्मऽभि: । क्लृप्त: । स: । हि । अस्या: । बन्धु: ॥१०.२३॥

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Meaning
१. वेदवाणी असुओं को-प्राणों को जन्म देने से 'असूसू' कही गई है। इस (असूस्व:) = प्राणशक्ति को जन्म देनेवाली वेदधेनु के (जायमानात् गर्भात्) = प्रादुर्भूत होते हुए गर्भ से (सर्वे अवेपन्त) = काम, क्रोध आदि सब शत्रु काँप उठते हैं। वेदज्ञान से हमें प्राणशक्ति प्राप्त होती है, इस प्राणशक्ति से सम्पन्न होकर हम काम, क्रोध आदि पर विजय प्राप्त करते हैं। २. (ससूव हि) = जब इस वेदधेनु ने निश्चय से प्राणशक्ति को जन्म दिया तब (ताम्) = उस वेदधेनु को (आहुः) = कहते हैं कि (वशा इति) = यह सचमुच 'वशा' है। शत्रुओं को वशीभूत करनेवाली है। इसका आराधक (ब्रह्मभिः क्लस:) = ज्ञान की वाणियों से शक्तिसम्पन्न बनता है [क्लप सामयें]। (स:) = वह शक्तिसम्पन्न व्यक्ति ही (अस्याः बन्धुः) = इसे अपने में बाँधनेवाला है।
Essence
जो भी वशा को अपने जीवन में बाँधता है, वह इसके द्वारा शक्तिसम्पन्न बनकर काम, क्रोध आदि को जीत लेता है। यह वशा प्राणशक्ति को जन्म देनेवाली है, इसप्रकार यह सचमुच शत्रुओं को वश में करनेवाली 'वशा' ही है।
Subject
असूसू:-वशा