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Atharvaveda - Mantra 22

Atharvaveda 10/10/22

10 Sukta
34 Mantra
10/10/22
Devata- वशा Rishi- कश्यपः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- वशागौ सूक्त
Mantra with Swara
यदु॒दरं॒ वरु॑ण॒स्यानु॒प्रावि॑शथा वशे। तत॑स्त्वा ब्र॒ह्मोद॑ह्वय॒त्स हि ने॒त्रमवे॒त्तव॑ ॥

यत् । उ॒दर॑म् । वरु॑णस्य । अ॒नु॒ऽप्रावि॑शथा: । व॒शे॒ । तत॑: । त्वा॒ । ब्र॒ह्मा । उत् । अ॒ह्व॒य॒त् । स: । हि । ने॒त्रम् । अवे॑त् । तव॑ ॥१०.२२॥

Mantra without Swara
यदुदरं वरुणस्यानुप्राविशथा वशे। ततस्त्वा ब्रह्मोदह्वयत्स हि नेत्रमवेत्तव ॥

यत् । उदरम् । वरुणस्य । अनुऽप्राविशथा: । वशे । तत: । त्वा । ब्रह्मा । उत् । अह्वयत् । स: । हि । नेत्रम् । अवेत् । तव ॥१०.२२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. सृष्टि के प्रारम्भ में यह वेदज्ञान प्रभु से प्रादुर्भूत होता है तथा प्रलय के आने पर प्रभु में ही चला जाता है। हे (वशे) = वेदधेनो! (यत्) = जो तू प्रलय के समय (वरुणस्य उदरम्) = उस पापनिवारक प्रभु के उदर में (अनुप्राविशथा:) = अनुप्रविष्ट हो जाती है, (त्वा) = उस तुझको (ब्रह्मा) = सर्वोत्तम सात्त्विक स्थितिवाला पुरुष ['ब्रह्मा देवानां प्रथमः संबभूव०'] (तत:) = वहाँ से (उद् अह्वयत्) = ऊपर पुकारता है। यह ब्रह्मा अग्नि के द्वारा ऋग्वेद का, वायु के द्वारा यजुर्वेद का, आदित्य के द्वारा सामवेद का, अङ्गिरा के द्वारा अथर्ववेद का ज्ञान प्रास करता है। (स:) = वह ब्रह्मा (हि) = निश्चय से (तव नेत्रम्) = तेरे नेत्र को-प्रणयन, नेतृत्व को, (अवेत्) = जानता है। ब्रह्मा तुझसे मार्गदर्शन प्राप्त करता है और औरों के लिए तुझे प्रास कराता है।
Essence
यह वेदवाणी प्रलयकाल में प्रभु में प्रविष्ट होकर रहती है। सष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्मा इसका आह्वान करता है तथा 'अग्नि, वायु, आदित्य व अङ्गिरा' द्वारा इसका दोहन करके वह औरों के लिए इसे प्राप्त करानेवाला बनता है।
Subject
स हि नेत्रमवेत् तव