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Atharvaveda - Mantra 20

Atharvaveda 10/10/20

10 Sukta
34 Mantra
10/10/20
Devata- वशा Rishi- कश्यपः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- वशागौ सूक्त
Mantra with Swara
आ॒स्नस्ते॒ गाथा॑ अभवन्नु॒ष्णिहा॑भ्यो॒ बलं॑ वशे। पा॑ज॒स्याज्जज्ञे य॒ज्ञ स्तने॑भ्यो र॒श्मय॒स्तव॑ ॥

आ॒स्न: । ते॒ । गाथा॑: । अ॒भ॒व॒न् । उ॒ष्णिहा॑भ्य: । बल॑म् । व॒शे॒ । पा॒ज॒स्या᳡त् । ज॒ज्ञे॒ । य॒ज्ञ: ।स्तने॑भ्य: । र॒श्मय॑: । तव॑ ॥१०.२०॥

Mantra without Swara
आस्नस्ते गाथा अभवन्नुष्णिहाभ्यो बलं वशे। पाजस्याज्जज्ञे यज्ञ स्तनेभ्यो रश्मयस्तव ॥

आस्न: । ते । गाथा: । अभवन् । उष्णिहाभ्य: । बलम् । वशे । पाजस्यात् । जज्ञे । यज्ञ: ।स्तनेभ्य: । रश्मय: । तव ॥१०.२०॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (वशे) = वेदधेनो! (ते आस्त्र:) = तेरे मुख से (गाथा: अभवन्) = गायन योग्य स्तोत्रों का प्रादुर्भाव हुआ। (उष्णिहाभ्य:) = ग्रीवा की नाड़ियो से (बलम्) = बल का प्रादुर्भाव हुआ। (पाजस्यात्) = तेरे उदर से (यज्ञः जज्ञे) = यज्ञ का प्रादुर्भाव हुआ। (तव स्तनेभ्य:) = तेरे स्तनों से (रश्मयः) = रश्मियों किरणों का प्रादुर्भाव हुआ। २. हे (वशे) = वेदधेनो! (तव) = तेरी (ईर्माभ्याम्) = भुजाओं से (च) = तथा (सक्थिभ्याम्) = दोनों जंघाओं से (अयनं जातम्) = दक्षिणायन व उत्तरायण का प्रादुर्भाव हुआ। (आन्त्रेभ्यः) = तेरी आँतों से (अन्नाः जज्ञिरे) = खाने योग्य पदार्थ प्रादुर्भूत हुए, तथा (उदरात अधि) = उदर से (वीरुधः) = प्रतानिनी [फैलनेवाली] बेलों का प्रादुर्भाव हुआ।
Essence
वेदधेनु के भिन्न-भिन्न अङ्गों से उन-उन वस्तुओं के प्रादुर्भाव का अभिप्राय इतना ही है कि बेदधेनु इन सब पदार्थों के ज्ञानरूप दुग्ध को देनेवाली है-वेद से हमें इन पदार्थों का ज्ञान प्राप्त होता है।
Subject
वेदधेनु के भिन्न-भिन्न अंग