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Atharvaveda - Mantra 19

Atharvaveda 10/10/19

10 Sukta
34 Mantra
10/10/19
Devata- वशा Rishi- कश्यपः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- वशागौ सूक्त
Mantra with Swara
ऊ॒र्ध्वो बि॒न्दुरुद॑चर॒द्ब्रह्म॑णः॒ ककु॑दा॒दधि॑। तत॒स्त्वं ज॑ज्ञिषे वशे॒ ततो॒ होता॑जायत ॥

ऊ॒र्ध्व: । बि॒न्दु: । उत् । अ॒च॒र॒त् । ब्रह्म॑ण: । ककु॑दात् । अधि॑ । तत॑: । त्वम् । ज॒ज्ञि॒षे॒ । व॒शे॒ । तत॑: । होता॑ । अ॒जा॒य॒त॒ ॥१०.१९॥

Mantra without Swara
ऊर्ध्वो बिन्दुरुदचरद्ब्रह्मणः ककुदादधि। ततस्त्वं जज्ञिषे वशे ततो होताजायत ॥

ऊर्ध्व: । बिन्दु: । उत् । अचरत् । ब्रह्मण: । ककुदात् । अधि । तत: । त्वम् । जज्ञिषे । वशे । तत: । होता । अजायत ॥१०.१९॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (ब्रह्मणः ककुदात् अधि) = [अधिः पञ्चम्यानुवादी] ज्ञान के शिखर के हेतु से (बिन्दुः) = वीर्यकण (ऊर्ध्वः उदचरत्) = शरीर में ऊर्ध्व गतिवाला हुआ, अर्थात् शरीर में जब शक्ति की ऊर्ध्वगति होती है, तभी यह शरीर में सुरक्षित हुई-हुई ज्ञानाग्नि का ईंधन बनती है और हम ज्ञान के शिखर पर पहुँचने के योग्य बनते हैं। २. हे (वशे) = कमनीये वेदधेनो। (ततः) = तभी-वीर्य की ऊर्ध्वगति होने पर ही (त्वं जज्ञिषे) = तू प्रादुर्भूत होती है-तेरे प्रकाश को यह ऊध्वरेता पुरुष ही प्राप्त करता है। (तत:) = तभी-वीर्य की ऊर्ध्वगति होने पर ही (होता) = वह सब साधनों को देनेवाला प्रभु (अजायत) = प्रादुर्भूत होता है-तभी हम हृदय में प्रभु का प्रकाश पाते हैं।
Essence
ज्ञान के शिखर पर पहुँचने के लिए, वेदवाणी के व प्रभु के प्रकाश को पाने के लिए आवश्यक है कि हम शरीर में वीर्य की ऊर्ध्वगतिवाले बनें।
Subject
ऊर्ध्वरेता बनना