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Atharvaveda - Mantra 18

Atharvaveda 10/10/18

10 Sukta
34 Mantra
10/10/18
Devata- वशा Rishi- कश्यपः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- वशागौ सूक्त
Mantra with Swara
व॒शा मा॒ता रा॑ज॒न्यस्य व॒शा मा॒ता स्व॑धे॒ तव॑। व॒शाया॑ य॒ज्ञ आयु॑धं॒ तत॑श्चि॒त्तम॑जायत ॥

व॒शा । मा॒ता । रा॒ज॒न्य᳡स्य । व॒शा । मा॒ता । स्व॒धे॒ । तव॑ । व॒शाया॑: । य॒ज्ञे । आयु॑धम् । तत॑: । चि॒त्तम् । अ॒जा॒य॒त॒ ॥१०.१८॥

Mantra without Swara
वशा माता राजन्यस्य वशा माता स्वधे तव। वशाया यज्ञ आयुधं ततश्चित्तमजायत ॥

वशा । माता । राजन्यस्य । वशा । माता । स्वधे । तव । वशाया: । यज्ञे । आयुधम् । तत: । चित्तम् । अजायत ॥१०.१८॥

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Meaning
१. (वशा) = यह कमनीया वेदधेनु ही (राजन्यस्य माता) = प्रजा का रञ्जन करनेवाले 'राजन्य' [क्षत्रिय] की माता है-वेदज्ञान ही उसे राजन्य बनाता है। मनु लिखते है कि ('सर्व लोकाधिपत्यं च वेदशास्त्रविदर्हति')। हे (स्वधे) = आत्मधारणशक्ते! यह (वशा) = वेदधेनु ही (तव माता) = तेरी माता है। वेद ही तुझे आत्मधारणशक्तिवाला व अपराश्रित बनाएगा। २. (वशाया:) = इस वेदधेनु का (आयुधम्) = शत्रुनिवारक शस्त्रसमूह (यज्ञे) = यज्ञ में निहित है। यज्ञों के द्वारा ही वेद हमें शत्रुओं के आक्रमण से रक्षित होने का उपदेश करता है-यज्ञों में प्रवृत्त व्यक्ति काम, क्रोध, लोभ' आदि का शिकार नहीं होता। (तत:) = उस वशा से ही 'काम, क्रोध, लोभ से अनाक्रान्त होने पर (चित्तम् अजायत) = सब संज्ञान उत्पन्न होता है[चिती संज्ञाने]।
Essence
वेदधेनु एक उत्तम क्षत्रिय को, आत्मधारणशक्ति को, यज्ञरूप आयुध को तथा संज्ञान को आविर्भूत करती हैं।
Subject
राजन्य, स्वधा, यज्ञ, चित्त