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Atharvaveda - Mantra 17

Atharvaveda 10/10/17

10 Sukta
34 Mantra
10/10/17
Devata- वशा Rishi- कश्यपः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- वशागौ सूक्त
Mantra with Swara
तद्भ॒द्राः सम॑गच्छन्त व॒शा देष्ट्र्यथो॑ स्व॒धा। अथ॑र्वा॒ यत्र॑ दीक्षि॒तो ब॒र्हिष्यास्त॑ हिर॒ण्यये॑ ॥

यत् । भ॒द्रा: । सम् । अ॒ग॒च्छ॒न्त॒ । व॒शा । देष्ट्री॑ । अथो॒ इति॑ । स्व॒धा । अथ॑र्वा । यत्र॑ । दी॒क्षि॒त: । ब॒र्हिषि॑ । आस्त॑ । हि॒र॒ण्यये॑ ॥१०.१७॥

Mantra without Swara
तद्भद्राः समगच्छन्त वशा देष्ट्र्यथो स्वधा। अथर्वा यत्र दीक्षितो बर्हिष्यास्त हिरण्यये ॥

यत् । भद्रा: । सम् । अगच्छन्त । वशा । देष्ट्री । अथो इति । स्वधा । अथर्वा । यत्र । दीक्षित: । बर्हिषि । आस्त । हिरण्यये ॥१०.१७॥

Meaning
१. (यत्र) = जहाँ (दीक्षितः) = व्रतों को ग्रहण किये हुए (अथर्वा) = स्थिरवृत्तिवाला [न थर्व] आत्मा लोचनशील [अथ अर्वाङ्] पुरुष (हिरण्यये) = ज्योतिर्मय-निर्मल-ईया-द्वेषादि मलों से रहित (बर्हिषि) = वासनाशून्य हृदय में (आस्त) = स्थित होता है, (तत्) = तो वहाँ (भद्राः) = कल्याण करनेवाली ये तीन बातें (सम् अगच्छन्त) = संगत होती है-एक तो (वशा) = वेदधेनु-यह उस अथर्वा को ज्ञानदुग्ध का पान कराती है, दूसरी (देष्ट्री) = प्रभु की प्रेरणा-वह उसके लिए कर्तव्य-कर्मों का निर्देश करती है, (अथो) = और (स्वधा) = आत्मधारणशक्ति-यह कभी पराश्रित नहीं होता और परिणामतः सुखी रहता है [सर्व परवशं दु:खं सर्वमात्मवशं सुखम्]।
Essence
हम स्थिरवृत्तिवाले [अथर्व] व व्रतमय जीवनवाले बनें। हमारा हृदय वासनाशून्य हो। ऐसे हृदय में स्थित होने पर प्रभु की वेदधेनु हमें ज्ञानदुग्ध का पान कराती है, प्रभु की प्रेरणा सुन पड़ती है तथा हम आत्मधारणशक्तिवाले बनते हैं।
Subject
वशा-देष्ट्री-स्वधा

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