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Atharvaveda - Mantra 15

Atharvaveda 10/10/15

10 Sukta
34 Mantra
10/10/15
Devata- वशा Rishi- कश्यपः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- वशागौ सूक्त
Mantra with Swara
सं हि सूर्ये॑णागत॒ समु॒ सर्वे॑ण॒ चक्षु॑षा। व॒शा स॑मु॒द्रमत्य॑ख्यद्भ॒द्रा ज्योतीं॑षि॒ बिभ्र॑ती ॥

सम् । हि । सूर्ये॑ण । अग॑त । सम् । ऊं॒ इति॑ । सर्वे॑ण । चक्षु॑षा । व॒शा । स॒मु॒द्रम् । अति॑ । अ॒ख्य॒त् । भ॒द्रा । ज्योतीं॑षि । बिभ्र॑ती ॥१०.१५॥

Mantra without Swara
सं हि सूर्येणागत समु सर्वेण चक्षुषा। वशा समुद्रमत्यख्यद्भद्रा ज्योतींषि बिभ्रती ॥

सम् । हि । सूर्येण । अगत । सम् । ऊं इति । सर्वेण । चक्षुषा । वशा । समुद्रम् । अति । अख्यत् । भद्रा । ज्योतींषि । बिभ्रती ॥१०.१५॥

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Meaning
१. यह (वशा) = कमनीया वेदधेनु (हि) = निश्चय से (सूर्येण) = [सरति] निरन्तर गतिवाले, अतएव चमकनेवाले पुरुष के साथ (सम् अगत) = संगत होती है (उ) = और यह वशा (सर्वेण चक्षुषा) = सब देखनेवालों के साथ (सम्) = संगत होती है-आँख बन्द करके चलनेवालों को यह वेदज्ञान नहीं प्राप्त होता। २. (भद्रा ज्योतींषि) = कल्याणकर ज्ञानज्योतियों को (बिभ्रती) = धारण करती हुई यह वशा (स-मुद्रम्) = प्रसन्न मनवाले पुरुष को (अति अख्यत्) = अतिशयेन देखती है-उसका यह पालन करती है [Look after]|
Essence
वेदवाणी को प्राप्त करने के लिए हम सूर्य की भौति निरन्तर गतिवाले व संसार में आँख खोलकर चलनेवाले बनें। प्रसन्न मनवाले होकर हम वेदवाणी की भद्र ज्योतियों को प्राप्त करने के पात्र हों।
Subject
सं सूर्यण