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Atharvaveda - Mantra 13

Atharvaveda 10/10/13

10 Sukta
34 Mantra
10/10/13
Devata- वशा Rishi- कश्यपः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- वशागौ सूक्त
Mantra with Swara
सं हि सोमे॒नाग॑त॒ समु॒ सर्वे॑ण प॒द्वता॑। व॒शा स॑मु॒द्रमध्य॑ष्ठाद्गन्ध॒र्वैः क॒लिभिः॑ स॒ह ॥

सम् । हि । सोमे॑न । अग॑त । सम् । ऊं॒ इति॑ । सर्वे॑ण । प॒त्ऽवता॑ । व॒शा । स॒मु॒द्रम् । अधि॑ । अ॒स्था॒त् । ग॒न्ध॒र्वै: । क॒लिऽभि॑: । स॒ह ॥१०.१३॥

Mantra without Swara
सं हि सोमेनागत समु सर्वेण पद्वता। वशा समुद्रमध्यष्ठाद्गन्धर्वैः कलिभिः सह ॥

सम् । हि । सोमेन । अगत । सम् । ऊं इति । सर्वेण । पत्ऽवता । वशा । समुद्रम् । अधि । अस्थात् । गन्धर्वै: । कलिऽभि: । सह ॥१०.१३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (हि) = निश्चय से (वशा) = यह कमनीया वेदधेनु सोमेन सोम के साथ (सम् आगत) = संगत होती है। जो भी व्यक्ति पृथिवी से उत्पन्न सौम्य भोजनों को करता हुआ शरीर में सोम [वीर्य] का रक्षण करता है, यह वेदवाणी उसे ही प्राप्त होती है। (उ) = और (सर्वेण पद्धता) = सय गतिशील [पद गती] व्यक्तियों से इसका (सम्) = मेल होता है। यह (वशा) = कमनीया वेदधेनु (समुद्रं अध्यष्ठात्) = [स मुद्] प्रसादयुक्त मनवाले व्यक्ति में अधिष्ठित होती है। (गन्धवैः कलिभिः सह) = ज्ञान की वाणियों को धारण करनेवाले [कला अस्य अस्तीति कली] कला-सम्पन्न पुरुषों के साथ यह वेदधेनु निवास करती है।
Essence
हम वेदज्ञान को प्राप्त करने के लिए सौम्य भोजन करनेवाले बनें, 'गतिशील प्रसन्न मनवाले, ज्ञानरुचि व कलावित्' हों।
Subject
सं सोमेन