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Atharvaveda - Mantra 10

Atharvaveda 10/1/10

10 Sukta
32 Mantra
10/1/10
Devata- कृत्यादूषणम् Rishi- प्रत्यङ्गिरसः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- कृत्यादूषण सूक्त
Mantra with Swara
यद्दु॒र्भगां॒ प्रस्न॑पितां मृ॒तव॑त्सामुपेयि॒म। अपै॑तु॒ सर्वं॒ मत्पा॒पं द्रवि॑णं॒ मोप॑ तिष्ठतु ॥

यत् । दु॒:ऽभगा॑म् । प्रऽस्न॑पिताम् । मृ॒तऽव॑त्साम् । उ॒प॒ऽए॒यि॒म् । अप॑ । ए॒तु॒ । सर्व॑म् । मत् । पा॒पम् । द्रवि॑णम् । मा॒ । उप॑ । ति॒ष्ठ॒तु॒ ॥१.१०॥

Mantra without Swara
यद्दुर्भगां प्रस्नपितां मृतवत्सामुपेयिम। अपैतु सर्वं मत्पापं द्रविणं मोप तिष्ठतु ॥

यत् । दु:ऽभगाम् । प्रऽस्नपिताम् । मृतऽवत्साम् । उपऽएयिम् । अप । एतु । सर्वम् । मत् । पापम् । द्रविणम् । मा । उप । तिष्ठतु ॥१.१०॥

Meaning
१. (यत्) = जब (दुर्भगाम्) = दौर्भाग्यवाली, अर्थात् जिसके पति पूर्व ही जा चुके हैं, (प्रस्थापिताम्) = जो शुद्ध आचरणवाली है, (मृतवत्साम्) = जो मृतपुत्रवाली है, अर्थात् जिसकी सन्तान भी चली गई है, अतएव जो बड़ी शोकातुर है, उस स्त्री को (उपेयिम) = हम समीपता से प्राप्त हों, तो उस समय (सर्वं पापम्) = सब पाप, अशुभ मनोवृत्ति (मत् अप एतु) = मुझसे दूर हो। (द्रविणं मा उपतिष्ठतु) = [strength, power, valour, prowess] शक्ति मुझे प्राप्त हो। इस शक्ति के द्वारा पाप से ऊपर उठा हुआ मैं उस शोकातुरा के लिए सहायक हो सकूँ।
Essence
असहाय परन्तु शुद्ध आचरणवाली स्त्री को पाकर हम पाप में न फंस जाएँ,अपितु शक्तिशाली बनकर हम उसके दुःख को कम करने में सहायक ही बनें।
Subject
पापम् अपतिष्ठतु द्रविणम् उप तिष्ठतु

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