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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 1/9/4

35 Sukta
4 Mantra
1/9/4
Devata- अग्निः Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- विजय प्रार्थना सूक्त
Mantra with Swara
ऐषां॑ य॒ज्ञमु॒त वर्चो॑ ददे॒ऽहं रा॒यस्पोष॑मु॒त चि॒त्तान्य॑ग्ने। स॒पत्ना॑ अ॒स्मदध॑रे भवन्तूत्त॒मं नाक॒मधि॑ रोहये॒मम् ॥

आ । ए॒षा॒म्‍ । य॒ज्ञम्‍ । उ॒त । वर्च॑: । द॒दे॒ । अ॒हम्‍ । रा॒य: । पोष॑म्‍ । उ॒त । चि॒त्तानि॑ । अ॒ग्ने॒ । स॒ऽपत्ना॑: । अ॒स्मत्‍ । अध॑रे । भ॒व॒न्तु॒ । उ॒त्‍ऽत॒मम्‍ । नाक॑म्‍ । अधि॑ । रो॒ह॒य॒ । इ॒मम्‍ ॥

Mantra without Swara
ऐषां यज्ञमुत वर्चो ददेऽहं रायस्पोषमुत चित्तान्यग्ने। सपत्ना अस्मदधरे भवन्तूत्तमं नाकमधि रोहयेमम् ॥

आ । एषाम्‍ । यज्ञम्‍ । उत । वर्च: । ददे । अहम्‍ । राय: । पोषम्‍ । उत । चित्तानि । अग्ने । सऽपत्ना: । अस्मत्‍ । अधरे । भवन्तु । उत्‍ऽतमम्‍ । नाकम्‍ । अधि । रोहय । इमम्‍ ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. गतमन्त्र के अनुसार सजातों में श्रेष्ठ बननेवाला व्यक्ति कहता है हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो! आपके द्वारा ज्ञान से श्रेष्ठता को प्राप्त कराया गया (अहम्) = मैं (एषाम्) = इन सजातों के (यज्ञम्) = यज्ञ को (उत वर्च:) = और शक्ति को (आ ददे) = देता हूँ-इनके जीवन को यज्ञात्मक बनाकर इन्हें विलास से ऊपर उठाता हूँ, परिणामतः इनकी शक्ति का वर्धन करता हूँ। यज्ञमय जीवन से ही शक्ति का वर्धन होता है। २. मैं इन्हें (रायस्पोषम्) = धन का पोषण प्रास कराता हूँ-धनार्जन योग्य बनाता हूँ (उत) = और साथ ही (चित्तानि) = इन्हें चित्तों को भी प्राप्त कराता हूँ। इनकी स्मृतियों को भी ठीक रखता हूँ ताकि ये अपने स्वरूप व जीवनोद्देश्य को [कोऽह, कुत आयातः] न भूलते हुए धन का सदा सव्यय ही करें। ३. हे प्रभो! आप ऐसी कृपा कीजिए कि (सपत्ना:) = काम, क्रोध, लोभ आदि शत्रु (अस्मत्) = हमारे (अधरे भवन्तु) = पाँवों-तले ही रहें, हम इन्हें पराजित करनेवाले हों। इसप्रकार हमें शत्रु-दलन के योग्य बनाकर आप (इमम्) = इस आपके भक्त को (उत्तम नाकम्) = उत्तम स्वर्गलोक में (अधिरोहय) = अधिरूढ़ कीजिए। कामादि सपत्न ही नरक के द्वार हैं, इन्हें जीतकर स्वर्ग क्यों न मिलेगा?
Essence
हमारा जीवन यज्ञमय हो जिससे हमारी शक्तियाँ जीर्ण न हों। हम धन के पोषण के साथ आत्म-स्मृतिवाले हों जिससे उन धनों के कारण विलासमय जीवनवाले न हो जाएँ।
Subject
यज्ञ व वर्चस्
Special
सूक्त का आरम्भ 'वसु व ज्योति' की प्राप्ति की प्रार्थना से होता है[१]। हम काम, क्रोध व लोभ को जीतकर उत्तम स्वर्गलोक का अधिरोहण करनेवाले हों [२]। हमें श्रेष्ठपद की प्राप्ति हो [३]। यज्ञमय जीवन से हम वर्चस्वी बने रहें। धनों के साथ आत्म-स्मरणवाले हों ताकि धन हमारे निधन का कारण न बन जाए [४]। असत्य भाषणादि पापों से हम ऊपर उठ सकें -