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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 1/9/3

35 Sukta
4 Mantra
1/9/3
Devata- अग्निः Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- विजय प्रार्थना सूक्त
Mantra with Swara
येनेन्द्रा॑य स॒मभ॑रः॒ पयां॑स्युत्त॒मेन॒ ब्रह्म॑णा जातवेदः। तेन॒ त्वम॑ग्न इ॒ह व॑र्धये॒मं स॑जा॒तानां॒ श्रैष्ठ्य॒ आ धे॑ह्येनम् ॥

येन॑ । इन्द्रा॑य । स॒म्‍ऽअभ॑र: । पयां॑सि । उ॒त्‍त॒मेन॑ । ब्रह्म॑णा । जा॒त॒ऽवे॒द॒: । तेन॑ । त्वम्‍ । अ॒ग्ने॒ । इ॒ह । व॒र्ध॒य॒ । इ॒मम्‍ । स॒ऽजा॒ताना॑म्‍ । श्रैष्‍ठ्ये॑ । आ । धे॒हि॒ । ए॒न॒म्‍ ॥

Mantra without Swara
येनेन्द्राय समभरः पयांस्युत्तमेन ब्रह्मणा जातवेदः। तेन त्वमग्न इह वर्धयेमं सजातानां श्रैष्ठ्य आ धेह्येनम् ॥

येन । इन्द्राय । सम्‍ऽअभर: । पयांसि । उत्‍तमेन । ब्रह्मणा । जातऽवेद: । तेन । त्वम्‍ । अग्ने । इह । वर्धय । इमम्‍ । सऽजातानाम्‍ । श्रैष्‍ठ्ये । आ । धेहि । एनम्‍ ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (जातवेदः) = सर्वज्ञ प्रभो! (येन) = जिस (उत्तमेन) = सर्वोत्कृष्ट ब्रह्मणा-ज्ञान से (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिए (पयांसि) = आप्यायनों को-शक्तियों के वर्धन को (समभर:) = आप भरते हो-जिस ज्ञान के द्वारा आप अन्नमयकोश में तेज को, प्राणमयकोश में वीर्य को, मनोमयकोश में ओज व बल को, विज्ञानमयकोश में मन्यु को तथा आनन्दमयकोश में सहस् को भरते हैं, (तेन) = उसी ज्ञान से हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो! (त्वम्) = आप (इह) = यहाँ-समाज में (इमम्) = इस वसु व उत्कृष्ट ज्योति को धारण करनेवाले पुरुष को (वर्धय) = बढ़ाइए-सब प्रकार से उन्नत कीजिए। २. इसप्रकार ज्ञान से उन्नत करके आप (एनम्) = इसे (सजातानाम्) = सजात पुरुषों में-समवयस्क पुरुषों में (श्रेष्ठवे) = श्रेष्ठ स्थान में (आधेहि) = स्थापित कीजिए। यह ज्ञान के द्वारा औरों से आगे बढ़ जाए। हे अने! आपका अग्नित्व इसे आगे बढ़ाने में ही तो प्रमाणित हो सकता है। ज्ञान के द्वारा यह सब प्रकार का वर्धन करके श्रेष्ठ बने और औरों का कल्याण करनेवाला हो।
Essence
ज्ञान से ही सारा आप्यायन होता है, उसे प्राप्त करके हम समवयस्कों में आगे

बढ़नेवाले हों।
Subject
श्रेष्ठ पद-प्राप्ति