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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 1/9/2

35 Sukta
4 Mantra
1/9/2
Devata- मन्त्रोक्ता Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- विजय प्रार्थना सूक्त
Mantra with Swara
अ॒स्य दे॑वाः प्र॒दिशि॒ ज्योति॑रस्तु॒ सूर्यो॑ अ॒ग्निरु॒त वा॒ हिर॑ण्यम्। स॒पत्ना॑ अ॒स्मदध॑रे भवन्तूत्त॒मं नाक॒मधि॑ रोहये॒मम् ॥

अ॒स्य । दे॒वा॒: । प्रऽदिशि॑ । ज्योति॑: । अ॒स्तु॒ । सूर्य॑: । अ॒ग्नि: । उ॒त । वा॒ । हिर॑ण्यम् ।स॒ऽपत्ना॑: । अ॒स्मत् । अध॑रे । भ॒व॒न्तु॒ । उ॒त्‍ऽत॒मम् । नाक॑म् । अधि॑ । रो॒ह॒य॒ । इ॒मम् ॥

Mantra without Swara
अस्य देवाः प्रदिशि ज्योतिरस्तु सूर्यो अग्निरुत वा हिरण्यम्। सपत्ना अस्मदधरे भवन्तूत्तमं नाकमधि रोहयेमम् ॥

अस्य । देवा: । प्रऽदिशि । ज्योति: । अस्तु । सूर्य: । अग्नि: । उत । वा । हिरण्यम् ।सऽपत्ना: । अस्मत् । अधरे । भवन्तु । उत्‍ऽतमम् । नाकम् । अधि । रोहय । इमम् ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (अस्य) = गतमन्त्र के अनुसार अपने-आपको वसु व उत्कृष्ट ज्योति में धारण करनेवाले पुरुष के (प्रदिशि) = आदेश में, कथन में, (ज्योतिः अस्तु) = ज्योति हो। यह जो कुछ बोले वह औरों को ज्ञान देनेवाला हो। इसके कथन में (सूर्यः) = सूर्य हो, (अग्नि:) = अग्नि हो (उत वा) = और या (हिरण्यम्) = हितरमणीय ज्योति हो। इसके कथन मस्तिष्करूप द्युलोक में ज्ञान का सूर्य उदय करनेवाले हों। उदर में जाठराग्नि को ठीक रखनेवाले हों और हृदयान्तरिक्ष में हितमरणीय ज्योति को स्थापित करनेवाले हों। २. इस सब उपदेश का यह परिणाम हो कि (सपत्ना:) = काम, क्रोध, लोभ आदि शत्रु (अस्मत् अधरे भवन्तु) = हमारे नीचे हों, अर्थात् हम उन्हें पाँवों तले कुचलने में समर्थ हों। ३. इसप्रकार लोकहित के कार्यों में लगे हुए (इमम्) = इस ज्ञान-प्रसारक पुरुष को उत्तम

(नाकम्) = उत्कृष्ट स्वर्गलोक में (अधिरोहय) = अधिरूढ़ कीजिए। यह स्वर्ग को प्राप्त करनेवाला हो, इसका जीवन सुखी हो।
Essence
प्राणशक्ति व प्रभु की ज्योति को प्राप्त करके हम लोकहित के लिए ज्ञान का प्रसार करें। उस ज्ञान से लोगों के मस्तिष्क, शरीर व हृदय को हम सुन्दर बनाने का प्रयत्न करें। लोग काम, क्रोध, लोभ को जीतने की भावना से भरे हों। इस लोकहित के द्वारा हम स्वर्ग के अधिकारी बनें।
Subject
उत्तम 'नाकलोक' का अधिरोहण