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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 1/8/4

35 Sukta
4 Mantra
1/8/4
Devata- अग्निः Rishi- चातनः Chhanda- बार्हतगर्भा त्रिष्टुप् Suktam- यातुधाननाशन सूक्त
Mantra with Swara
यत्रै॑षामग्ने॒ जनि॑मानि॒ वेत्थ॒ गुहा॑ स॒ताम॒त्त्रिणां॑ जातवेदः। तांस्त्वं ब्रह्म॑णा वावृधा॒नो ज॒ह्ये॑षां शत॒तर्ह॑मग्ने ॥

यत्र॑ । ए॒षा॒म् । अ॒ग्ने॒ । जनि॑मानि । वेत्थ॑ । गुहा॑ । स॒ताम् । अ॒त्त्रिणा॑म् । जा॒त॒ऽवे॒द॒:।तान् । त्वम् । ब्रह्म॑णा । व॒वृधा॒न: । ज॒हि । ए॒षा॒म् । श॒त॒ऽतर्ह॑म् । अ॒ग्ने॒ ॥

Mantra without Swara
यत्रैषामग्ने जनिमानि वेत्थ गुहा सतामत्त्रिणां जातवेदः। तांस्त्वं ब्रह्मणा वावृधानो जह्येषां शततर्हमग्ने ॥

यत्र । एषाम् । अग्ने । जनिमानि । वेत्थ । गुहा । सताम् । अत्त्रिणाम् । जातऽवेद:।तान् । त्वम् । ब्रह्मणा । ववृधान: । जहि । एषाम् । शतऽतर्हम् । अग्ने ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१, हे (जातवेदः अग्ने) = ज्ञान का प्रसार करनेवाले और ज्ञान द्वारा ही उन्नति-पथ पर ले चलनेवाले ब्राह्मण! (एषां गुहा सताम्) = गुफाओं में छिपकर रहनेवाले इन (अन्त्रिणाम्) = औरों को खा-जानेवाले-हानि पहुँचानेवाले यातुधानों के (जनिमानि) = उत्पन्न सन्तानों को (यत्र) = जहाँ भी (वेत्थ) = जानते हो, जहाँ भी इनके वंशजों का पता लगे, वहीं पहुँचकर (त्वम्) = तू (तान) = उन सबको ब्रह्मणा-ज्ञान के प्रसार से (वावृधान:) = खूब ही वृद्धि-पथ पर ले-चलता हुआ (अग्ने) = हे ब्राह्मण !तू (एषां शततई जहि) = इनका शतशः प्रकारों से विनाश कर दे। इनके जीवन की कमियों को दूर करके इनके जीवन को सुन्दर बना दे।
Essence
यातुधानों की प्रजाओं के सुधार से यातुधानत्व की परम्परा चल नहीं पाती। उसका मूल में ही विनाश हो जाता है।
Subject
यातुधानत्व की परम्परा का विनाश
Special
सूक्त के प्रारम्भ में ही कहा गया है कि प्रजा के धन का समाज-सुधार के लिए ऐसा उपयोग हो कि यातुधान इसप्रकार नष्ट हो जाएँ जैसेकि नदी फेन को नष्ट कर देती है [१]। सुधरने के सङ्कल्पवाले आगत यातुधानों का हमें स्वागत करना चाहिए [२] । सुधार प्रेम से ही सम्भव है [३]। इनकी सन्तानों को प्रेम से सुधारकर यातुधानत्व की परम्परा को मूल में ही विनष्ट कर देना चाहिए। इस प्रकार वैयक्तिक व सामाजिक सुधार होने पर प्रार्थना करते हैं -