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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 1/8/3

35 Sukta
4 Mantra
1/8/3
Devata- अग्निः Rishi- चातनः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- यातुधाननाशन सूक्त
Mantra with Swara
या॑तु॒धान॑स्य सोमप ज॒हि प्र॒जां नय॑स्व च। नि स्तु॑वा॒नस्य॑ पातय॒ पर॒मक्ष्यु॒ताव॑रम् ॥

या॒तु॒ऽधान॑स्य । सो॒म॒ऽप॒ । ज॒हि । प्र॒ऽजाम् । नय॑स्व । च॒ । ‍नि:। स्तु॒वा॒नस्य॑ । पा॒त॒य॒ । पर॑म् । अक्षि॑ । उ॒त । अव॑रम् ॥

Mantra without Swara
यातुधानस्य सोमप जहि प्रजां नयस्व च। नि स्तुवानस्य पातय परमक्ष्युतावरम् ॥

यातुऽधानस्य । सोमऽप । जहि । प्रऽजाम् । नयस्व । च । ‍नि:। स्तुवानस्य । पातय । परम् । अक्षि । उत । अवरम् ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (सोमप) = सोम का-वीर्यशक्ति का अपने अन्दर ही पान करनेवाले, अतएव उत्साह सम्पन्न ज्ञान-प्रसारक विद्वन् ! तू (यातुधानस्य) = इन प्रजापीड़कों की (प्रजाम्) = सन्तति को (जहि) = [हन् गतौ] प्राप्त करनेवाला हो (च) = और उन्हें ज्ञान देकर (नयस्व) = उत्तम मार्ग से ले-चल। २. तुम्हारे प्रेमभरे कार्यों को देखकर यातुधान को भी लज्जा अनुभव हो कि 'कहाँ मैं और कहाँ ये लोग। 'औरों को कष्ट पहुँचाना ही मेरा पेशा बना हुआ है और उन्होंने किस प्रकार लोक-सेवा का कार्य अपनाया है। इसप्रकार (स्तुवानस्य) = ज्ञान-प्रसारकों की स्तुति करते हुए इस पश्चात्तापयुक्त पुरुष की (परम्) = उत्कृष्ट, अर्थात् दक्षिण (उत) = और (अवरम्) = निचली, अर्थात् वाम (अक्षि) = आँख को (निपातय) = तू झुकानेवाला हो। ज्ञान-प्रसारक क्रूरचित्त यातुधान को अपने व्यवहार से लज्जित करके ही सुधार सकता है।
Essence
यातुधानों की सन्तति से मेल करके उमति-पथ पर ले-चलने का यत्न होना चाहिए। इस प्रेमभरे कार्य को देखकर यातुधान भी लजित होंगे और अवश्य सन्मार्ग का ग्रहण करेंगे।
Subject
प्रेम से सुधार