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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 1/8/2

35 Sukta
4 Mantra
1/8/2
Devata- अग्नीषोमौ Rishi- चातनः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- यातुधाननाशन सूक्त
Mantra with Swara
अ॒यं स्तु॑वा॒न आग॑मदि॒मं स्म॒ प्रति॑ हर्यत। बृह॑स्पते॒ वशे॑ ल॒ब्ध्वाग्नी॑षोमा॒ वि वि॑ध्यतम् ॥

अ॒यम् । स्तु॒वा॒न: । आ । अ॒ग॒म॒त् । इ॒मम् । स्म॒ । प्रति॑ । ह॒र्य॒त॒ । बृह॑स्पते । वशे॑ । ल॒ब्ध्वा । अग्नी॑षोमा । वि । वि॒ध्य॒त॒म् । ॥

Mantra without Swara
अयं स्तुवान आगमदिमं स्म प्रति हर्यत। बृहस्पते वशे लब्ध्वाग्नीषोमा वि विध्यतम् ॥

अयम् । स्तुवान: । आ । अगमत् । इमम् । स्म । प्रति । हर्यत । बृहस्पते । वशे । लब्ध्वा । अग्नीषोमा । वि । विध्यतम् । ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. गतमन्त्र के अनुसार परिवर्तित जीवनवाला (अयम्) = यह भूतपूर्व यातुधान (स्तुवान:) = अपने ज्ञानदाता की प्रशंसा करता हुआ (आगमत्) = आया है। यह अब पुन: समाज का अङ्ग बनना चाहता है, अत: आप (इमम्) = इससे (स्म) = अवश्य (प्रतिहर्यत) = प्रीति करनेवाले होओ-इसे अपने में मिला लेने की कामनेवाले होओ। यदि इसे अब भी घृणा से देखते रहे तो इसके पुन: गलत मार्ग पर चले जाने का भय हो सकता है। २. हे (बृहस्पते) = ज्ञान के पति ब्राह्मण ! अब ऐसी व्यवस्था करो कि (अग्रिषोमा) = अग्नि और सोम इसे (वशे लब्ध्वा) = अपने वश में करके (विविध्यतम्) = विशेषरूप से विद्ध करें। इसमें अग्नि व सोम बनने का भाव प्रबल हो, वह भाव इसके हृदय में जड़ जमाए। यह निश्चय कर ले कि मुझे आगे बढ़नेवाला अग्नि बनना है और उन्नत होकर सोम-"विनीत' बने रहना है। निरभिमानता मेरी उन्नति का भूषण बनेगी।
Essence
भूतपूर्व यातुधान अपने जीवन को परिष्कृत करके समाज में आता है तो सामाजिकों को चाहिए कि प्रेम से उसका स्वागत करें। यह प्रेम उसे 'अग्नि और सोम' बनने की भावना में दृढ़ करनेवाला होगा।
Subject
स्वागत