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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 1/7/6

35 Sukta
7 Mantra
1/7/6
Devata- अग्निः Rishi- चातनः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- यातुधाननाशन सूक्त
Mantra with Swara
आ र॑भस्व जातवेदो॒ ऽस्माकार्था॑य जज्ञिषे। दू॒तो नो॑ अग्ने भू॒त्वा या॑तु॒धाना॒न्वि ला॑पय ॥

आ । र॒भ॒स्व॒ । जा॒त॒ऽवे॒द: । अ॒स्माकं॑ । अर्था॑य । ज॒ज्ञि॒षे॒ । दू॒त: । न॒: । अ॒ग्ने॒ । भू॒त्वा । या॒तु॒ऽधाना॑न् । वि । ला॒प॒य॒ ॥

Mantra without Swara
आ रभस्व जातवेदो ऽस्माकार्थाय जज्ञिषे। दूतो नो अग्ने भूत्वा यातुधानान्वि लापय ॥

आ । रभस्व । जातऽवेद: । अस्माकं । अर्थाय । जज्ञिषे । दूत: । न: । अग्ने । भूत्वा । यातुऽधानान् । वि । लापय ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (जातवेदः) = ज्ञान का प्रादुर्भाव करनेवाले ब्राह्मण! (आरभस्व) - तू अपने कार्य को आरम्भ कर । (अस्माकार्थाय) = राष्ट्र को उत्तम व सुखी बनानेरूप हमारे कार्य के लिए (जज्ञिषे) = तू उत्पन हुआ है। राजा का कर्तव्य 'प्रजापालन' ही तो है। इस प्रजापालनरूप कार्य के दो मुख्य अंश ये हैं-[क] बाह्य शत्रु के साथ युद्ध तथा [ख] अन्तः दुर्जनों को दण्डादि से सुधारना। इनमें इस पिछले कार्य में ब्राह्मण राजा के लिए बड़ा सहायक होता है। २. इस ब्राह्मण से राजा कहता है कि हे (अग्ने) = ज्ञान-प्रसार के द्वारा उन्नति-पथ पर ले-जानेवाले ब्राह्मण! तू (न:) = हमारा (दूत:) = सन्देशवाहक (भूत्वा) = होकर (यातुधानान्) = पीड़ा देनेवाले इन दुर्जनों को (विलापय) = पश्चात्ताप से विलाप करनेवाला बना दे। ये अपने कुकर्मों के लिए रो उठें और फिर से न करने के लिए दृढ़ निश्चयी हों।
Essence
राष्ट्र से दुर्जनों को दूर करने के कार्य में ब्राह्मण राजा का दाहिना हाथ बनें। वे उन्हें ज्ञान देकर सुधरने की भावना से भर दें।
Subject
राजा का सहायक ब्राह्मण