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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 1/7/5

35 Sukta
7 Mantra
1/7/5
Devata- अग्निः Rishi- चातनः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- यातुधाननाशन सूक्त
Mantra with Swara
पश्या॑म ते वी॒र्यं॑ जातवेदः॒ प्र णो॑ ब्रूहि यातु॒धाना॑न्नृचक्षः। त्वया॒ सर्वे॒ परि॑तप्ताः पु॒रस्ता॒त्त आ य॑न्तु प्रब्रुवा॒णा उपे॒दम् ॥

पश्या॑म । ते॒ । वी॒र्यम् । जा॒त॒वे॒द॒: । प्र । न॒: । ब्रू॒हि॒ । या॒तु॒धाना॑न् । नृ॒च॒क्ष॒:। त्वया॑ । सर्वे॑ । परि॑तप्ता: । पु॒रस्ता॑त् । ते । आ । य॒न्तु॒ । प्र॒ब्रु॒वा॒णा: । उप॑ । इ॒दम् ॥

Mantra without Swara
पश्याम ते वीर्यं जातवेदः प्र णो ब्रूहि यातुधानान्नृचक्षः। त्वया सर्वे परितप्ताः पुरस्तात्त आ यन्तु प्रब्रुवाणा उपेदम् ॥

पश्याम । ते । वीर्यम् । जातवेद: । प्र । न: । ब्रूहि । यातुधानान् । नृचक्ष:। त्वया । सर्वे । परितप्ता: । पुरस्तात् । ते । आ । यन्तु । प्रब्रुवाणा: । उप । इदम् ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. राजा सुधारक से कहता है-हे (जातवेदः) = [जात: वेदः यस्मात्] गतमन्त्रों में उल्लिखित यातुधानों में ज्ञान का प्रचार करनेवाले ज्ञानिन्! (ते वीर्य पश्याम) = हम तेरे पराक्रम को देखें। हे (नृचक्ष:) = मनुष्यों के लिए मार्ग-दर्शन का कार्य करनेवाले ब्राह्मण! तू (यातुधानान्) = इन प्रजा पीड़कों के प्रति (न:) = हमारे सन्देश को (प्रबूहि) = अच्छी प्रकार कह दे। राजा का सन्देश यही तो है कि 'तुम यातुधानत्व को छोड़कर सज्जनों का जीवन बितानेवाले बनो, इसी में तुम्हारा और सारे राष्ट्र का कल्याण है'। ब्राह्मण की शक्ति इसी में तो है कि वह इन यातुधानों को यह सन्देश प्रभावशाली रूप से सुना सके। २. हे ब्राह्मण! (त्वया) = तुझसे-तेरे उपदेश से प्रभावित होकर ते (सर्वे) = ये सारे यातुधान (परितप्ता:) = सन्ताप व पश्चात्ताप अनुभव करते हुए (पुरस्तात् आयन्तु)-अपने छिपने के स्थानों को छोड़कर सामने आ जाएँ। (इदम्) = अपने पश्चात्ताप को (प्रबुवाणा:) = कहते हुए वे (उप) = हमारे समीप प्राप्त हों। ब्राह्मणों के उपदेश का इन यातुधानों पर यह प्रभाव हो कि वे राजा के प्रति अपना समर्पण कर दें और अपने पश्चात्ताप की भावना को स्पष्ट रूप से कह दें।
Essence
ब्राह्मण का प्रभाव तभी व्यक्त होता है जब उसके उपदेश से प्रभावित होकर यातुधान अपने छिपने के स्थानों को छोड़कर राजा के प्रति अपना अर्पण कर दें।
Subject
ब्राह्मण की शक्ति