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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 1/7/4

35 Sukta
7 Mantra
1/7/4
Devata- अग्निः Rishi- चातनः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- यातुधाननाशन सूक्त
Mantra with Swara
अ॒ग्निः पूर्व॒ आ र॑भतां॒ प्रेन्द्रो॑ नुदतु बाहु॒मान्। ब्रवी॑तु॒ सर्वो॑ यातु॒मान॒यम॒स्मीत्येत्य॑ ॥

अ॒ग्नि: । पूर्व॑: । आ । र॒भ॒ता॒म् । प्र । इन्द्र॑: । नु॒द॒तु॒ । बा॒हु॒मान् ।ब्रवी॑तु । सर्व॑: । या॒तु॒मान् । अ॒यम् । अ॒स्मि॒ । इति॑ । आ॒ऽइत्य ॥

Mantra without Swara
अग्निः पूर्व आ रभतां प्रेन्द्रो नुदतु बाहुमान्। ब्रवीतु सर्वो यातुमानयमस्मीत्येत्य ॥

अग्नि: । पूर्व: । आ । रभताम् । प्र । इन्द्र: । नुदतु । बाहुमान् ।ब्रवीतु । सर्व: । यातुमान् । अयम् । अस्मि । इति । आऽइत्य ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (अग्नि:) = ज्ञान-प्रसार द्वारा उन्नति-पथ पर ले-चलनेवाला ब्राह्मण (पूर्वः आरभताम्) = प्रथम अपने कार्य को आरम्भ करे। ब्राह्मण का यह कार्य बहुत उत्तमता से तभी चल सकता है जबकि राज्य-शक्ति उसकी पीठ पर हो, अतः मन्त्र में कहा गया कि (बाहमान) = शक्तिशाली (इन्द्र:) = राजा (प्रनुदतु) = उन प्रचारकों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करनेवाला हो। इन सुधारकों को राजा की ओर से सब प्रकार की सुविधा प्रास हो। २. इन सुधारकों का कार्यक्रम इतना प्रभावोत्पादक व मधुर हो कि (सर्व: यातुमान्) = प्रजा में पीड़ा का आधान करनेवाले सब दुर्जन लोग प्रभावित होकर उस अग्नि के प्रति अपना समर्पण [surrender] करनेवाले हों और (एत्य) = आकर (बबीतु) = स्वयं कहें कि (अयम्) = यह (अस्मि इति) = मैं हूँ। मैं आपकी शरण में हूँ। आप से दिये जानेवाले दण्ड को मैं सहर्ष स्वीकार करूँगा और आगे से इस असत् कार्य में मैं कभी प्रवृत्त न होऊँगा।
Essence
राज्यशक्ति की सहायता प्राप्त करके सुधारक अपना कार्य इस सुन्दरता से करें कि सब दुर्जन अपनी दुर्जनता को छोड़ने का निश्चय कर, आत्मसमर्पण कर दें।
Subject
यातुधानों का आत्मसमर्पण