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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 1/7/2

35 Sukta
7 Mantra
1/7/2
Devata- अग्निः Rishi- चातनः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- यातुधाननाशन सूक्त
Mantra with Swara
आज्य॑स्य परमेष्ठि॒ञ्जात॑वेद॒स्तनू॑वशिन्। अग्ने॑ तौ॒लस्य॒ प्राशा॑न यातु॒धाना॒न्वि ला॑पय ॥

आज्य॑स्य । प॒र॒मे॒स्थि॒न् । जात॑वेद: । तनू॑वशिन् । अग्ने॑ । तौ॒लस्य॑ । म । अ॒शा॒न॒ । या॒तु॒धाना॑न् । वि । ला॒प॒य॒ ॥

Mantra without Swara
आज्यस्य परमेष्ठिञ्जातवेदस्तनूवशिन्। अग्ने तौलस्य प्राशान यातुधानान्वि लापय ॥

आज्यस्य । परमेस्थिन् । जातवेद: । तनूवशिन् । अग्ने । तौलस्य । म । अशान । यातुधानान् । वि । लापय ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. सुधारक ब्राह्मण से कहते हैं कि (परमेष्ठिन्) = उच्च स्थान में स्थित होनेवाले, प्रकृति व जीव से ऊपर उठकर हृदयस्थ 'प्रभु' में स्थित होनेवाले! (जातवेदः) = प्रभु में स्थित होकर ज्ञान का प्रकाश प्राप्त करनेवाले! (तनुवशिन्) = अपने शरीर को वश में करनेवाले! (अग्ने) = ज्ञानप्रकाश के द्वारा उन्नति के कारणभूत ब्राह्मण! (आज्यस्य) = घी का (तौलस्य प्राशान) = तोलकर प्रयोग करनेवाला बन। तेरा भोजन मपा-तुला हो। यह परिमित व युक्त आहार ही तेरे स्वास्थ्य को ठीक रक्खेगा और वस्तुत: तेरी इस संयतवृत्ति का ही उन यातुधान और किमीदिन लोगों पर प्रभाव पड़ेगा। तु संयत जीवन के क्रियात्मक उपदेश के द्वारा यातुधानान्-इन पीड़ित करनेवाले दुष्टों को विलापय-नष्ट कर दे, रुला दे। ये अपने रद्दी जीवन पर पश्चात्ताप में विलाप करें। इनकी वृत्ति में परिवर्तन हो ये 'यातुधान' न रह जाएँ।
Essence
प्रचारक ब्राह्मण युक्ताहारवाले होकर अपने संयत जीवन से यातुधानों के जीवन में भी परिवर्तन कर दें।
Subject
प्रचारक का युक्ताहारवाला जीवन