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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 1/7/1

35 Sukta
7 Mantra
1/7/1
Devata- अग्निः Rishi- चातनः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- यातुधाननाशन सूक्त
Mantra with Swara
स्तु॑वा॒नम॑ग्न॒ आ व॑ह यातु॒धानं॑ किमी॒दिन॑म्। त्वं हि दे॑व वन्दि॒तो ह॒न्ता दस्यो॑र्ब॒भूवि॑थ ॥

स्तु॒वा॒नम् । अ॒ग्ने॒ । आ । व॒ह॒ । या॒तु॒धान॑म् । कि॒मी॒दिन॑म् ।त्वम् । हि । दे॒व॒ । व॒न्दि॒त: । ह॒न्ता । दस्यो॑: । व॒भूवि॑थ ॥

Mantra without Swara
स्तुवानमग्न आ वह यातुधानं किमीदिनम्। त्वं हि देव वन्दितो हन्ता दस्योर्बभूविथ ॥

स्तुवानम् । अग्ने । आ । वह । यातुधानम् । किमीदिनम् ।त्वम् । हि । देव । वन्दित: । हन्ता । दस्यो: । वभूविथ ॥

Meaning
१. एक ब्राह्मण उन व्यक्तियों में प्रचार-कार्य आरम्भ करता है जो सदाचार का जीवन न बिताकर कदाचार में पड़ जाते हैं। उसके उपदेश से प्रभावित होकर वे अपने जीवन में परिवर्तन लाते हैं और इस प्रचारक का स्तवन करनेवाले होते हैं कि इसने जीवन में उत्तम परिवर्तन ला दिया। इन परिवर्तित जीवनवाले व्यक्तियों को यह ब्राह्मण फिर से समाज का अङ्ग बनाता है। मन्त्र में कहते हैं कि हे (अग्रे) = ज्ञानप्रकाश के द्वारा उन्नति-पथ पर ले-चलनेवाले ब्राह्मण! तू (स्तुवानम्) = इन स्तुति करनेवालों को (आवह) = समाज में ले-आ। आज तक ये (यातुधानम्) = पीड़ा का आधान करनेवाले बने हुए थे तथा (किमीदिनम्) = इनका प्रतिक्षण यही बोल होता था कि 'किम् अदानि' क्या खाऊँ। ये औरों को पीड़ित करते थे और उनके द्रव्यों को अन्याय से छीनकर भोगों के बढ़ाने में लगे हुए थे। २. हे देव-ज्ञान-प्रकाश देनेवाले ज्ञानिन्! (त्वं हि) = आप ही निश्चय से (वन्दितः) = इन परिवर्तित जीवनवाले यातुधानों से वन्दित होते हुए (दस्यो:) = [दस् उपक्षये] इन क्षय करनेवालों के (हन्ता) = नाशक (बभूविथ) = होते हो। इनकी दस्युवृत्ति को समाप्त करके आप इन्हें दस्यु नहीं रहने देते। औरों को पीड़ा न देने के कारण अब ये 'यातुधान' नहीं रहे। प्रतिक्षण 'क्या खाऊँ' इस बात का जाप न करने से ये अब 'किमीदिन्' नहीं रहे । क्षय की वृत्ति से ऊपर उठ जाने से इनका दस्युत्व समाप्त हो गया है।
Essence
राष्ट्र में ब्राह्मण जोकि अग्नि और देव है, वे 'यातुधानों, किमीदिनों व दस्युओं' के जीवन को ज्ञान-प्रचार के द्वारा परिवर्तित करके उन्हें फिर से समाज का अङ्ग बना देते हैं।
Subject
परिवर्तन

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