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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 1/6/4

35 Sukta
4 Mantra
1/6/4
Devata- अपांनपात् सोम आपश्च देवताः Rishi- सिन्धुद्वीपं कृतिः, अथवा अथर्वा Chhanda- पथ्यापङ्क्तिः Suktam- जल चिकित्सा सूक्त
Mantra with Swara
शं न॒ आपो॑ धन्व॒न्या॑३ शमु॑ सन्त्वनू॒प्याः॑। शं नः॑ खनि॒त्रिमा॒ आपः॒ शमु॒ याः कु॒म्भ आभृ॑ताः। शि॒वा नः॑ सन्तु॒ वार्षि॑कीः ॥

शम् । न॒: । आप॑: । ध॒न्व॒न्या: । शम् । ऊं॒ इति॑ । स॒न्तु॒ । अ॒नू॒प्या: । शम् । न॒: । ख॒नि॒त्रिमा॑: । आप॑: । शम् । ऊं॒ इति॑ । या: । कुम्भे । आऽभृ॑ता: । शि॒वा: । न॒: । स॒न्तु । वार्षि॑की: ॥

Mantra without Swara
शं न आपो धन्वन्या३ शमु सन्त्वनूप्याः। शं नः खनित्रिमा आपः शमु याः कुम्भ आभृताः। शिवा नः सन्तु वार्षिकीः ॥

शम् । न: । आप: । धन्वन्या: । शम् । ऊं इति । सन्तु । अनूप्या: । शम् । न: । खनित्रिमा: । आप: । शम् । ऊं इति । या: । कुम्भे । आऽभृता: । शिवा: । न: । सन्तु । वार्षिकी: ॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (न:) = हमारे लिए (धन्वन्या:) = मरुस्थल के शाद्वल प्रदेशों में होनेवाले (आप:) = जल (शम्) = शान्तिकर हों, (उ) = और (अनूप्या:) = कच्छ प्रदेशों, खादर में होनेवाले जल भी (शं सन्तु) = शान्ति देनेवाले हों। (खनित्रिमा:) = भूमि को खोदकर कुओं से प्राप्त होनेवाले (आपः) = जल (न:) = हमें (शम्) = शान्ति दें। (उ) = और (या:) = जो (कुम्भे) = घड़े में (अभृतः) = भरकर रक्खे गये हैं, वे जल भी हमारे लिए शान्ति दें और अन्त में बार्षिकी:-वृष्टि से प्राप्त होनेवाले जल (नः शिवा:) = हमारे लिए कल्याणकर हों। एवं, ये विविध प्रकार के जल हमें अनुकूलता के साथ नौरोग करते हुए शान्ति दें व हमारा कल्याण करें। २. भिन्न-भिन्न जल प्राप्त होते हैं, यहाँ इन सब जलों से नीरोगता के लिए प्रार्थना की गई है।
Essence
विविधरूप में प्राप्त होनेवाले जल हमारा कल्याण करें।
Subject
विविध जल
Special
सूक्त के आरम्भ में कहा है कि जल रोगों का शमन व भयों का यावन करनेवाले हैं [१]। इनमें सब औषध विद्यमान है [२]। ये जल आरोग्य के लिए कवच हैं [३] । विविध प्रकार के जल हमारा कल्याण करें [४]। जलों के प्रयोग से शरीर को निर्दोष बनाकर अब उत्तम प्रचार व दण्ड-व्यवस्था से समाज-शरीर को निर्दोष बनाने का प्रकरण उपस्थित करते हैं। बहाव के धर्मवाले जलों का अन्दर-बाहर दो प्रकार से प्रयोग करके अपना रक्षण करनेवाला 'सिन्धुढीप'४ व ५ सुक्तों का ऋषि था। सिन्धूनां द्विधा प्रयोगेण आत्मानं पाति' इति सिन्धुद्वीपः। अठारहवें सूक्त के दो भाग हैं। एक भाग वह है जिसमें अशुभ लक्षणों का प्रतिपादन हैं और दूसरा भाग वह है जिसमें उन लक्षणों को दूर करने के उपायों का प्रतिपादन है। ये दोनों भाग मिन-से अवश्य हैं, परन्तु वे अत्यन्त स्पष्ट हैं। क्या शरीर के और क्या मन के सभी विकार 'निर्माणात्मक कार्यों में लगे रहने से, द्वेष न करने से, स्नेह से, काम-क्रोध-लोभ को काबू करने से, अनुकूल मति से, अनुकूल आत्म-प्रेरणा से ब प्रभु-स्मरण से' दूर होते हैं। विकारों का दूर होना ही सौभाग्य प्राति है। समाज के दोषों का नाश करनेवाला 'चातन' 'चातयति नाशयति' इति चातन: ७ व ८ सूक्तों का ऋषि है -